बुलबुल आई...
कुलबुल करती बुलबुल आई, उछल कूद मचाती है, घर आंगन में अपनी बोली से मन को महकाती है। बुलबुल के बच्चे भी अब चिंव चिंव करते हैं, जल्द उछल कूद मचाने की अपनी मां से जिद करते हैं। घर के नए मेहमानों से मन को मिला सुकून है, घोंषले को देखकर ही मन करता है उड़ने। कास हम भी बुलबुल होते, इनके मन की बातों को सुन और समझ तो पाते। बुलबुल की कोलाहल ने घर में नए मेहमानों के साथ बनाया बसेरा है, मानो किसी अपने ही साथ रहते हों। हर घड़ी इनके बारे में सोचकर कुछ करने को मन करता है, मानो अपनों को ही गले लगाकर जीने को जी करता है। इंसानों और पक्षियों में कुछ अंतर समझने की कोशिश करता हूँ, यह घोंषले में ही घर बना लेते हैं,परिवार के साथ रहते हैं। हम घर में ही घोंषला तोड़ते रहते हैं। एक दूसरे के साथ नहीं बल्कि एक दूसरे से दूरियां बनाने में ही जीवन को गुजार देते हैं। बुलबुल तुम जहां भी रहना,उड़ना और उड़ते ही जाना, आसमान के ऊंचे गगन पर मस्त मगन हो विचरते रहना। यहां बहुत तनाव है, बड़ा दबाव है, अपनों में ही अलगाव है, तुम मस्त गगन में मुस्कुराती रहना, हम इंसानों में भी अपनी प्यारी मिठास भरी मिसरी घोलो। आई बुलबुल जबसे घर में, छाई है प्यारी सी सबके चेहरे पर मुस्कान, मानो आया हो कोई दूर देश से अपने घर का ही मेहमान।
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