सावन...
अब बदरी में कजरी कहां... सावन में झूले की पेंच कहां.. तो शायद अब सावन झूम के भी नहीं आता सखियों की खिलखिलाहट भी कम दिखती है... इन दिनों मौसम गुलजार है।सावन के मौसम में रिमझिम बारिश की फुहारों से मौसम भी खुशगवार है। हालांकि शहरों में बारिश की फुहार से चिकचिक और झिकझिक करते ही अधिक लोग मिलेंगे। इसका आनंद लेते काफी कम लोगी नजर आते हैं। ऐसा प्रतीत होता है समय के साथ, इस मौसम के लिए मायने बदल गए हैं, या तो हमारे पास समय नहीं है, या जिनके पास समय है वह इस मौसम का आनंद नहीं ले पा रहा है या फिर वह सावन के रस को महसूस नहीं कर पाते। एक समय था जब सावन के मौसम के आने का इंतजार लोगों को काफी रहता था। खासकर ग्रामीण क्षेत्र में। अब भले ही हर तरफ बम भोले हर हर महादेव की गूंज से हर क्षेत्र गुंजायमान है,लेकिन इन सबके बीच लोकगीतों की अपनी अलग परंपरा रही है। लोकगीत संभवतः इस मौसम में अधिक गाए जाते रहे हैं। कजरी से लेकर ठुमरी, पचरा तक लोग सुनते थे और सुनाते थे। भले ही हमें इस बारे में कोई ज्ञान और भान नहीं है , लेकिन गांव में हमने भी देखा है की झूलों पर बैठते ही सखियों का समूह लोकगीत गाता था।अब वह गीत तो य...