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सावन...

अब बदरी में कजरी कहां... सावन में झूले की पेंच कहां.. तो शायद अब सावन झूम के भी नहीं आता सखियों की खिलखिलाहट भी कम दिखती है... इन दिनों मौसम गुलजार है।सावन के मौसम में रिमझिम बारिश की फुहारों से मौसम भी खुशगवार है। हालांकि शहरों में बारिश की फुहार से चिकचिक और झिकझिक करते ही अधिक लोग मिलेंगे। इसका आनंद लेते काफी कम लोगी नजर आते हैं। ऐसा प्रतीत होता है समय के साथ, इस मौसम के लिए मायने बदल गए हैं, या तो हमारे पास समय नहीं है, या जिनके पास समय है वह इस मौसम का आनंद नहीं ले पा रहा है या फिर वह सावन के रस को महसूस नहीं कर पाते। एक समय था जब सावन के मौसम के आने का इंतजार लोगों को काफी रहता था। खासकर ग्रामीण क्षेत्र में। अब भले ही हर तरफ बम भोले हर हर महादेव की गूंज से हर क्षेत्र गुंजायमान है,लेकिन इन सबके बीच लोकगीतों की अपनी अलग परंपरा रही है। लोकगीत संभवतः इस मौसम में अधिक गाए जाते रहे हैं। कजरी से लेकर ठुमरी, पचरा तक लोग सुनते थे और सुनाते थे। भले ही हमें इस बारे में कोई ज्ञान और भान नहीं है , लेकिन गांव में हमने भी देखा है की झूलों पर बैठते ही सखियों का समूह लोकगीत गाता था।अब वह गीत तो य...

अब वर्तमान में

 फिर नई पारी ... जब पत्रकारिता में आया तो विशेष कोई ज्ञान नहीं था।सेल्स और कॉल सेंटर जैसी नौकरी छोड़कर पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा था। ऐसे में सब कुछ बिल्कुल अनजान था और आज भी एक तरह से अंजान ही है। मैं पत्रकारिता का कोई खिलाड़ी नहीं हूं,आज भी बिल्कुल अनाड़ी ही हूं। हर कदम पर सीखना ही है। पत्रकारिता में सीखने का कोई अंत नहीं होता। पत्रकारिता का ककहरा सिखाने वाले बिपिन बिहारी राय भैया इस क्षेत्र में लेकर के आए। वैसे बड़ा सहयोग अजय विद्यार्थी भैया, परितोष दुबे भैया, केडी पार्थ भैया और रविंद्र राय सर का भी रहा है। बाबूलाल टाक, दिलीप भाटी और राजीव हर्ष का भी काफी मार्गदर्शन रहा। तारकेश्वर मिश्रा सर के संपादकीय नेतृत्व में भी काम करने का मौका मिला राजस्थान पत्रिका में शुरुआत एक बड़े संस्थान से हुई थी ऐसे में काफी कुछ सीखने को मिला था जो रमता नहीं वह राम नहीं टिकना तो मौत है। पत्रकारिता में परिवर्तन जगत का नियम है। ऐसा मैं नहीं कहता कई सारे बंधुओं ने यह सिखाया है, सीधे तौर पर नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष तौर पर। चाहे वह मिथिलेश धर दुबे जी हों या फिर संतोष पांडे भैया। इनसे मुलाकात ना होने ...