अब वर्तमान में
फिर नई पारी ...
जब पत्रकारिता में आया तो विशेष कोई ज्ञान नहीं था।सेल्स और कॉल सेंटर जैसी नौकरी छोड़कर पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा था। ऐसे में सब कुछ बिल्कुल अनजान था और आज भी एक तरह से अंजान ही है। मैं पत्रकारिता का कोई खिलाड़ी नहीं हूं,आज भी बिल्कुल अनाड़ी ही हूं। हर कदम पर सीखना ही है। पत्रकारिता में सीखने का कोई अंत नहीं होता। पत्रकारिता का ककहरा सिखाने वाले बिपिन बिहारी राय भैया इस क्षेत्र में लेकर के आए। वैसे बड़ा सहयोग अजय विद्यार्थी भैया, परितोष दुबे भैया, केडी पार्थ भैया और रविंद्र राय सर का भी रहा है। बाबूलाल टाक, दिलीप भाटी और राजीव हर्ष का भी काफी मार्गदर्शन रहा। तारकेश्वर मिश्रा सर के संपादकीय नेतृत्व में भी काम करने का मौका मिला राजस्थान पत्रिका में शुरुआत एक बड़े संस्थान से हुई थी ऐसे में काफी कुछ सीखने को मिला था जो रमता नहीं वह राम नहीं टिकना तो मौत है। पत्रकारिता में परिवर्तन जगत का नियम है। ऐसा मैं नहीं कहता कई सारे बंधुओं ने यह सिखाया है, सीधे तौर पर नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष तौर पर। चाहे वह मिथिलेश धर दुबे जी हों या फिर संतोष पांडे भैया। इनसे मुलाकात ना होने के बाद भी फेसबुक के माध्यम से हमेशा संपर्क में रहा। इसके अलावा फोन पर भी हमेशा बातचीत होती रही है। ऐसे में स्पष्ट है कि किसी भी एक संस्थान में रहकर आप पत्रकारिता की सेवा नहीं कर सकते या यूं भी कह सकते हैं कि आपके मन में बेचैनी सी होने लगती है।
राजस्थान पत्रिका कोलकाता से शुरू हुआ सफर प्रभात वार्ता, दैनिक जागरण, एक बार फिर राजस्थान पत्रिका बेंगलुरु और कोयंबटूर में जारी रहा। यहां काम करने के दौरान विशेषकर बेंगलुरु में कई साथियों से मिला। इसमें निखिल भाई, जीवेंद्र झा सर , मंजूर भाई, भरत यादव अंकल जी और खासकर राजेंद्र शेखर व्यास सर का नाम लेना उल्लेखनीय होगा क्योंकि उन्होंने काफी मौके दिए। कोयंबटूर में संतोष पांडे सर के नेतृत्व में काम करने का मौका मिला। यहां खास करके राहुल शर्मा सर , शहजाद खान सर और अनुराज पांडे भाई के साथ काफी समय बीता। पत्रकारिता के खट्टे मीठे अनुभव को सहेजने के बाद एक बार मौका मिला सन्मार्ग में आने का। यहाँ 2016 में सफर शुरू हुआ। कोविड-19 के दौरान चुनौतीपूर्ण तरीके से संपादक सुरेंद्र सिंह जी के नेतृत्व में काम हुआ। उनकी नेतृत्व क्षमता वास्तव में काफी सराहनीय है। वैसे यहां रहने के दौरान ही दैनिक जागरण रांची में परीक्षा देकर आ चुका था। इसके बाद हैदराबाद में 1 साल पहले ही प्रसन्न भाई के सहयोग से मौका मिलने वाला था , लेकिन उसे भुना नहीं सका। एक बार फिर से इसी साल फरवरी में भी जाने की पूरी तैयारी थी, लेकिन पारिवारिक कारण से वहां जाना ना हो सका। इस बीच मौका मिला वर्तमान हिंदी में जुड़ने का तो भला करता क्या न करता जुड़ गया वर्तमान से। अब तक का सबसे अधिक समय सन्मार्ग में ही व्यतीत हुआ। यहां के साथियों का हमेशा ही भरपूर सहयोग मिला। किसी खास का नाम नहीं ले सकता क्योंकि सभी ने हमेशा आगे बढ़ने के लिए पूरा सहयोग किया। यूं भी कहा जा सकता है कि काफी प्रेरित किया। काफी देर से लिखने का मतलब यह है कि इधर व्यस्तता के कारण समय नहीं मिल पा रहा था कि सभी को जानकारी दे सकूं कि अब मैं वर्तमान हिंदी दैनिक से जुड़ चुका हूं। जुड़ाव सबसे पहले की तरह ही रहेगा। कई सारे व्हाट्सएप समूह से हट चुका हूं ऐसे में धीरे-धीरे जुड़ने का प्रयास जारी है। उम्मीद है कि सभी मित्रों का सहयोग और बड़ों का आशीष पहले की तरह ही मिलता रहेगा। पत्रकारिता में कोई बहुत बड़ी क्रांति करूंगा ऐसा कभी नहीं सोचा। बस काम करता जा रहा हूं, काम करते रहना है। सीख रहा हूं, सीखते रहना है। अब रवि शंकर सिंह और लोकनाथ तिवारी भैया के नेतृत्व में एक बार फिर से नई पारी की शुरुआत हुई है। सहयोगी के तौर पर अरविंद चौधरी भैया, ईश्वर भैया, सुशील भैया, राहुल भाई, सुनील जी , राकेश जी, इम्तियाज भाई सहित अनेकों सहयोगी हैं। खासकर वर्तमान समूह की पूरी टीम साथ है।
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