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तस्वीर बदलनी चाहिये

भारतीय रेलवे की परिसेवा में अब भी कई जगहों पर चिर परिचित तस्वीर नजर आती है। उदाहरण के तौर ट्रेन के प्लेटफार्म पर पहुंचने के पहले ही अब भी रेल यात्रियों में ट्रेन में सवार होने को लेकर अनुशासन नदारद है। यात्री इस कदर टूट पड़ते हैं कि ट्रेन ठहर नहीं सकती,वह भाग जाएगी। वैसे है तो ऐसा ही लेकिन ट्रेन का समय निर्धारित है। इस तरफ यदि चाहें यात्री जागरूक रहकर तय समय से ट्रेन पकड़ सकते हैं। दूसरी तरफ ट्रेनों की संख्या बढ़ी है लेकिन यात्रियों की जनसंख्या के आधार पर यह अब भी शायद नाकाफी है। तस्वीर काफी भयावह और चौंकाने  वाली है। आरक्षित डिब्बों में अनारक्षित यात्री यात्रा करने को मजबूर हैं। आखिरकार सबको ट्रेन यात्रा से ही मंजिल तय करनी है। इधर रेल आधुनिकीकरण का काम चल रहा है। इस कारण ओडिशा की काफी ट्रेनें रद्द हैं। यात्री अधिक जुर्माना देकर यात्रा करने को तैयार हैं। इस क्षेत्र में यह उपाय हो सकता है कि भारतीय रेलवे की तरफ से अतिरिक्त ट्रेन ऐसे रूटों पर संचालित की जाएं जहाँ कि यात्री अधिक हैं। तस्वीर और बेहतर हो सकती है। दूसरी तरफ ट्रेनों में आरपीएफ कर्मियों की मौजूदगी को अनिवार्य बनाया जा सकता ह...

ननिहाल की यादें...

 डॉ.दिवाकर प्रसाद पांडे जिन्हें कि बच्चा बाबू के नाम से भी गुजरपार में जाना जाता है। केवल गुजरपार ही क्या सच कहूं तो आसपास के क्षेत्रों में भी नाना जी का नाम आज भी मशहूर है। नानाजी उस जमाने में एसीओ सहायक चकबंदी अधिकारी थे। इसके बाद वह सीओ भी हुए। बक्सर से लेकर विभिन्न जिलों में उन्होंने अपनी परिसेवा दी। होम्योपैथिक मेडिकल की पढ़ाई की थी। तत्कालीन कोलकाता से ही उन्होंने किसी मेडिकल कॉलेज से डिग्री ली थी हालांकि मुझे नाम याद नहीं । इसके अलावा और भी काफी कुछ जिसके बारे में अधिक जानकारी शायद मुझे भी नहीं है,उन्होंने जीवन में हासिल किया। उन्होंने बीएचयू (बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी) से भी डिग्री हासिल की थी। नाना जी की अचानक याद इसलिए आ गई क्योंकि वह डायरी लिखते थे।ज्यादातर जीवन के संस्मरण को कविताओं के माध्यम से व्यक्त करते थे।उनकी डायरी काफी समय तक मेरे पास रही, लेकिन बाद में हमारे मुंबई वाले मामा जी के पास चली गई। दरअसल अपनी योजना थी कि उस डायरी को किताब का रूप दिया जाए ,लेकिन  किन्हीं कारणों से ऐसा नहीं हो सका। नाना जी कई भाषाओं के ज्ञानी थे। हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू,बांग्ला...