ननिहाल की यादें...
डॉ.दिवाकर प्रसाद पांडे जिन्हें कि बच्चा बाबू के नाम से भी गुजरपार में जाना जाता है। केवल गुजरपार ही क्या सच कहूं तो आसपास के क्षेत्रों में भी नाना जी का नाम आज भी मशहूर है। नानाजी उस जमाने में एसीओ सहायक चकबंदी अधिकारी थे। इसके बाद वह सीओ भी हुए। बक्सर से लेकर विभिन्न जिलों में उन्होंने अपनी परिसेवा दी। होम्योपैथिक मेडिकल की पढ़ाई की थी। तत्कालीन कोलकाता से ही उन्होंने किसी मेडिकल कॉलेज से डिग्री ली थी हालांकि मुझे नाम याद नहीं । इसके अलावा और भी काफी कुछ जिसके बारे में अधिक जानकारी शायद मुझे भी नहीं है,उन्होंने जीवन में हासिल किया। उन्होंने बीएचयू (बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी) से भी डिग्री हासिल की थी। नाना जी की अचानक याद इसलिए आ गई क्योंकि वह डायरी लिखते थे।ज्यादातर जीवन के संस्मरण को कविताओं के माध्यम से व्यक्त करते थे।उनकी डायरी काफी समय तक मेरे पास रही, लेकिन बाद में हमारे मुंबई वाले मामा जी के पास चली गई। दरअसल अपनी योजना थी कि उस डायरी को किताब का रूप दिया जाए ,लेकिन किन्हीं कारणों से ऐसा नहीं हो सका। नाना जी कई भाषाओं के ज्ञानी थे। हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू,बांग्ला पर उनकी पकड़ थी। गांव में एक रसूखदार व्यक्तित्व के तौर पर जाने जाते थे। उस जमाने में उनके पास लाइसेंसी बंदूक थी, जो कि कहा जाता है कि तत्कालीन समय में चोर डकैतों से बचाव के लिए रखना हर घर के लिए आवश्यक था। पुराने लोग बताते हैं कि कई बार डकैतों के हमले भी हुए थे। अपना ननिहाल जो कि तमसा नदी भी कहा जाता है, उसी के किनारे मौजूद है। गुजरपार गांव यदि आपने नदिया के पार फिल्म देखी होगी तो यूं समझ लीजिए कि वहां के नदी का दृश्य और अपने ननिहाल का दृश्य बिल्कुल एक समान है। उसमें ज्यादा कुछ बदलाव नहीं है। बचपन में ननिहाल जाने पर मंदिर नाना के घर के ठीक सामने ही मौजूद है। इसके सामने नदी मौजूद है। नदी में नहाना और मंदिर में आराधना करना यह हम सबका रोज का काम था। बड़ा सा पीपल का वृक्ष जो कि आज भी मौजूद है और लोगों को छाया प्रदान कर रहा है। उसकी शोर यानी की जड़ पकड़कर हम सब खेलते थे। इस दौरान सोनू मामा हम सबसे सीनियर होने के नाते विशेष ध्यान रखते थे। बबलू भाई हमारे मामा के लड़के और हम करीब करीब हमउम्र होने के कारण एक साथ जमकर उछल कूद मचाते थे। अब मंदिर का काफी कायापलट हो चुका है। ननिहाल की पगडंडी भी काफी बदल चुकी है। नाना ने मुबारकपुर के सीटीसी मान्टेसरी स्कूल में नाम भी लिखवाया था। वहां छोटे मामा का नाम लेकर के ही जीप से चलकर घर तक आना जाना हो जाता था। लेकिन शायद पढ़ाई लिखाई बंगाल से ही होना मंजूर था । समय के साथ ही साथ जब कोलकाता आना हुआ तो इसके बाद जब भी गांव पहुंचता था तो नाना के पास एक रेडियो हुआ करती थी। वह पहुंचने के साथ ही इस रेडियो को मुझे सौंप दिया करते थे। शायद उन्हें ऐसा प्रतीत होता था कि इसकी मुझे ज्यादा जरूरत है। क्योंकि धीरे बड़े होने के साथ-साथ बचपन की अठखेलियों से हम दूर होते गए और मनोरंजन के अन्य साधनों की ओर झुकाव बढ़ता गया। रेडियो से मेरा लगाव शुरू से ही था यह नाना बखूबी जानते थे। इसलिए ननिहाल में पहुंचने के साथ ही रेडियो पकड़ा देते थे। अब रेडियो पर कौन सा चैनल सुनना है यह अपने ऊपर निर्भर करता था। वैसे ज्यादातर विविध भारती के सभी कार्यक्रम सुनता था। आपकी फरमाइश ज्यादा पसंद आती थी, क्योंकि इसमें दूरदराज के लोगों की फरमाइश के गाने सुनाया जाते थे। विविध भारती आज भी जेहन में एक अलग अहसास कराती है। उसके कार्यक्रम दूसरी दुनिया की ओर ले जाते हैं। भले ही मोबाइल की दुनिया में स्मार्टफोन के जमाने में आज किसी भी कार्यक्रम से लेकर किसी भी गाने की जानकारी यूट्यूब से लेकर अलग-अलग माध्यमों से मौजूद है लेकिन उस जमाने में रेडियो सुनना वाकई एक अलग बात थी। दरअसल बात नाना की हो रही है। सुबह 3:00 बजे ही वह उठा देते थे।अब भले ही उठने का समय काफी बढ़ गया है, लेकिन वह सुबह उठाने के साथ ही साथ संस्कृत के कुछ न कुछ मंत्र याद करवाते थे। इसके बावजूद संस्कृत का ज्ञान नहीं हो सका इसका आज भी काफी अफसोस होता है। नाना ने हर किसी को आगे बढ़ाने से लेकर प्रेरित करने का पूरा काम किया। उन्होंने पुरजोर कोशिश की कि हर कोई कुछ न कुछ खास मुकाम हासिल कर सके। अपना डॉक्टरी चेंबर उन्होंने घर पर ही खोल रखा था। किसी न किसी मर्ज से जुड़े लोग रोजाना ही घर पर आते थे। इसमें ज्यादातर लोगों को निशुल्क दवाएं ही वह देते थे। खेती बारी से लेकर जीवन पर्यंत उन्होंने सभी जिम्मेदारियों का बेहतर तरीके से निर्वहन किया। आज भी उनकी ईमानदारिता के लोग कायल हैं। नाना जी आप जहां भी हैं, वहां से अपना आशीर्वाद इसी प्रकार हम सब पर बनाए रहें। ताकि आप से प्रेरणा लेकर के हम जीवन के पथ पर अग्रसर रहें। गुजरपार की चुंगी के साथ ही साथ हुआ ट्यूबवेल वाले बगीचे पर लेकर अक्सर वह जाते थे, जहां कटहल से लेकर आम,अमरूद के और आंवला सहित वहां मौजूद थे। आज भी वह बागीचा मौजूद है। उनकी रोपी बगिया से आज भी लोग महक रहे हैं। यह महक आगे भी कायम रहे यही कामना हम सब की है। उनके बगिया में उनकी बिखेरी सुगंध सब तक पहुंचे यही इच्छा है। सब एक साथ रहें एकजुट रहें। वैसे मां बताती हैं कि एक शब्द में काफी उस समय बोलता था ।वह है बबलू क गुरु हइं राजू क चेला मोछिया पर ताव देके रहीला अकेला। लेकिन यकीन मानिए कभी अकेले रहने की इच्छा नहीं रही। एक साथ एकजुट रहने की इच्छा रही। शुक्रिया छोटे मामा के पुत्र और हमारे हरदिल अजीज भाई गौरव पांडे जी का जिन्होंने की कुछ तस्वीरें साझा की हैं जो कि आज भी उनके मोबाइल में मौजूद है।इस तस्वीर के लिए शुक्रिया गौरव भाई। तस्वीर में बबलू भाई के साथ हीकुंदन भाई और गौरव भी मौजूद हैं।
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