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मजदूर दिवस यूं ही तारीख न रह जाए

 मजदूर दिवस के इतिहास की बातें नहीं बल्कि हकीकत की बातें होनी जरूरी हैं। मजदूर दिवस के नाम पर आज भारत समेत कई देशों में श्रमिक अधिकारों के नाम पर श्रमिकों को अवकाश तो मिलता है। हालां‌कि इस अ‍वकाश के लिए भी पहले के श्रमिकों को कड़े आंदोलन व अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ी थी। आलम यह है कि श्रम अधिकारों की बातें तो आज हर वर्ग के लोग करते हैं, हालांकि श्रमिकों का शोषण कितना हो रहा है वह एक श्रमिक ही जानता है। यह श्रमिक वर्ग कौन है, बात यह नहीं है। बात केवल यही है ‌कि हर श्रमिक को उसकी मेहनत व लगन का मेहनताना, उसका अधिकार मिलना चाहिए। काम के अनुसार वेतन की बातें होनी चाहिए। श्रम अधिकारों के लिए आंदोलन के नाम पर अब राजनीतिक दलों से लेकर श्रम संगठनों को सोचने की आवश्यकता है। एक श्रमिक अपने श्रम का ही हिस्सा चाहता है। श्रमिकों का विकास आज कहां और किस हद तक हुआ है, यह भी काफी सोचनीय विषय है। ऐसा तो नहीं कि श्र‌मिक वर्ग की तस्वीर बदल गई है। तस्वीर आज भी आजादी के पहले की तरह ही है। बड़े पैमाने पर आज भी श्रमिक वर्ग शोषण के शिकार हो रहे हैं। शोषण जारी है, इसके तरीके बदल गए हैं। श्रम अधिकारों के प...

यह पोलूशन का बताते हैं सॉल्यूशन

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हावड़ा: जलवायु परिवर्तन का असर कुछ इस कदर है कि आसमान से मानो आग बरस रही हो। यह आग का अंगारा इस कदर पड़ रहा है कि लोग बेबस और लाचार हैं। अचानक बढ़ते तापमान से आज हर व्यक्ति हर शहर हर गांव में परेशान है। आलम यह है कि बढ़ते शहरीकरण के दौर में प्रदूषण को लेकर चिंताएं तो बहुत की गई, लेकिन इसका समाधान अब तक नहीं निकल पाया है। यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में आसमान से गर्मी नहीं बल्कि आग के गोलों की तरह मौसम हो जाएगा। जरूरत है तो इस स्थिति को बदलने की।हालांकि यह स्थिति कैसे बदलेगी यह किसी को सटीक जानकारी नहीं है। ऐसे में प्रदूषण से लड़ने का एक खास सॉल्यूशन दे रहे हैं पेशे से सीएस लेकिन पर्यावरण के बड़े हितैषी संतोष मेहता। टेरेस पर ही बना दी बगिया, गमले ही उग आए आम- वैसे तो काफी लोगों को बागवानी करना पसंद है, लेकिन बागवानी के सही तरीके और कम जगह पर ही बेहतर फूल व फल उगा लेना बड़ी बात है। संतोष मोहता कंसर्न फॉर अर्थ नामक स्वयंसेवी संगठन चलाते हैं।चेतला स्थित अपने निवास के पास ही उन्होंने टेरेस पर बगिया सी बना रखी है। वह लंबे समय से पर्यावरण को लेकर काम भी कर रहे हैं। उन्होंने अपनी छत पर ही ब...

रिश्तों की टूटती डोर, अपनों से भागते अपने...

 जीवन की गाड़ी सही चल रही है।सब अपने आप में मगन हैं।मुस्कुराते हैं। चेहरा भी खिला खिला सा रहता है।स्टेटस भी बढ़िया रहता है। हर दिन फोन से लेकर सोशल मीडिया पर वाहवाही है। लेकिन कई बार उनके चेहरे पर कुछ कमी सी नजर आई है मुझे। उनके मतलब कइयों से है।शायद अपनों से है। अपनों में मैं कभी कमियां नहीं निहारता या निहारा भी नहीं, या कभी समय नहीं मिला।वह भी शायद समय नहीं निकाल पाया होगा। वैसे भी भला कोई अपनों में कोई कमियां निहारता है क्या? वह भी व्यस्त है।9 से 6 की नौकरी करता है। शाम को परिवार के साथ मॉल में नजर आता है और फिर ढेर सारी तस्वीरें अलग अलग एंगल में।।अपनों के लाईक और कमेंट वाली जिंदगी से वह काफी खुश है।लेकिन जैसे ही उसके अपने याद करते हैं वज भागना चाहता। कॉल रिसीव नहीं करता। शायद डरता है कहीं कोई कुछ पूछ न ले।हाल न जान ले।या कोई कुछ मांग न ले।आखिर वह दे भी क्या सकता है बस भागमभाग में ही तो है। जेब तो उसकी भी खाली रहती है।बस स्टेट्स सिंबल ने ही बचा रखा है उसे। वह रोज भागता है अपनों से, रिश्तों की डोर से कि कहीं कोई बांध न ले। या यूं कहें कि अपनापन न दिखा दे। अपनों में अपनापन बचा ही कह...