रिश्तों की टूटती डोर, अपनों से भागते अपने...
जीवन की गाड़ी सही चल रही है।सब अपने आप में मगन हैं।मुस्कुराते हैं। चेहरा भी खिला खिला सा रहता है।स्टेटस भी बढ़िया रहता है। हर दिन फोन से लेकर सोशल मीडिया पर वाहवाही है। लेकिन कई बार उनके चेहरे पर कुछ कमी सी नजर आई है मुझे। उनके मतलब कइयों से है।शायद अपनों से है। अपनों में मैं कभी कमियां नहीं निहारता या निहारा भी नहीं, या कभी समय नहीं मिला।वह भी शायद समय नहीं निकाल पाया होगा। वैसे भी भला कोई अपनों में कोई कमियां निहारता है क्या? वह भी व्यस्त है।9 से 6 की नौकरी करता है। शाम को परिवार के साथ मॉल में नजर आता है और फिर ढेर सारी तस्वीरें अलग अलग एंगल में।।अपनों के लाईक और कमेंट वाली जिंदगी से वह काफी खुश है।लेकिन जैसे ही उसके अपने याद करते हैं वज भागना चाहता। कॉल रिसीव नहीं करता। शायद डरता है कहीं कोई कुछ पूछ न ले।हाल न जान ले।या कोई कुछ मांग न ले।आखिर वह दे भी क्या सकता है बस भागमभाग में ही तो है। जेब तो उसकी भी खाली रहती है।बस स्टेट्स सिंबल ने ही बचा रखा है उसे। वह रोज भागता है अपनों से, रिश्तों की डोर से कि कहीं कोई बांध न ले। या यूं कहें कि अपनापन न दिखा दे। अपनों में अपनापन बचा ही कहाँ। लेकिन इन्हीं में कई अपने हैं जो जबरन टूटते रिश्तों की डोर को जोर से बांधने पर तुले रहते हैं।ऐसे अपनों को वह पाजी और उल्लू समझता है, अनपढ़ शायद, जो उसे अपनेपन में बांधने की कोशिश करता रहता। एक दिन वह अपना भी उसी की राह पर चल पड़ा।वह भी शहर और मॉल की चकाचौंध भरी रोशनी में आगे निकलने की होड़ में शामिल हो गया। अब दोनों ही अपनों से दूर हैं, पर एक झुँझलाहट है दोनों में। नींद नहीं आती, फिर बात होती है एक दिन जमकर और फिर नींद आ जाती है। दवा नहीं की बस उस अपने से अपनी परेशानी ही तो साझा की थी उसने, उसने तो कुछ किया भी नहीं बस यही कहा भाई मैं हूँ।कभी भी कॉल करना। आपकी जिंदगी भी कहीं इन दोनों अपनों की तरह तो नहीं। सोचें।जरूर सोचें। एक डॉक्टर की बताई स्टोरी हूबहू आपके सामने।वैसे यह रिश्तों के लिए है फरिश्तों के लिए नहीं।
(अपने पर न लें क्योंकि अपनों के लिए नहीं है, बस यूं ही कुछ भी लिख दिया यार)
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