सावन...
अब बदरी में कजरी कहां...
सावन में झूले की पेंच कहां..
तो शायद अब सावन झूम के भी नहीं आता
सखियों की खिलखिलाहट भी कम दिखती है...
इन दिनों मौसम गुलजार है।सावन के मौसम में रिमझिम बारिश की फुहारों से मौसम भी खुशगवार है। हालांकि शहरों में बारिश की फुहार से चिकचिक और झिकझिक करते ही अधिक लोग मिलेंगे। इसका आनंद लेते काफी कम लोगी नजर आते हैं। ऐसा प्रतीत होता है समय के साथ, इस मौसम के लिए मायने बदल गए हैं, या तो हमारे पास समय नहीं है, या जिनके पास समय है वह इस मौसम का आनंद नहीं ले पा रहा है या फिर वह सावन के रस को महसूस नहीं कर पाते। एक समय था जब सावन के मौसम के आने का इंतजार लोगों को काफी रहता था। खासकर ग्रामीण क्षेत्र में। अब भले ही हर तरफ बम भोले हर हर महादेव की गूंज से हर क्षेत्र गुंजायमान है,लेकिन इन सबके बीच लोकगीतों की अपनी अलग परंपरा रही है। लोकगीत संभवतः इस मौसम में अधिक गाए जाते रहे हैं। कजरी से लेकर ठुमरी, पचरा तक लोग सुनते थे और सुनाते थे। भले ही हमें इस बारे में कोई ज्ञान और भान नहीं है , लेकिन गांव में हमने भी देखा है की झूलों पर बैठते ही सखियों का समूह लोकगीत गाता था।अब वह गीत तो याद नहीं लेकिन परंपरा बिल्कुल जेहन में उतर आती है।
गांव में स्थिति है रहती थी कि सबसे मजबूत और बड़ा पेड़ और खुली जगह खोजा जाता था, ताकि एक बड़ा झूला वहां पर डाला जा सके। इसके बाद भीड़ जुटना शुरू हो हो जाता था। युवाओं की ही नहीं हर वर्ग की टोली ही यहां होती थी। मजबूत लोग पेंग मारतेते थे और झूले का आनंद लोग जमकर लेते थे। एक बड़े झूले पर कम से 10-12 लोग तो आ ही जाते थे। अब न ही ऐसे मजबूत पेड़ नजर आते हैं, ना खुली जगह ना ही उस परंपरा का निर्वहन करने वाले लोग। सावन बस एक महीना बन कर रह गया है। आने वाली पीढ़ी या अभी की पीढ़ी शायद ही सावन के इस दृश्यों को देख पा रही हो या समझ पा रही हो या उसका आनंद ले पा रही हो। इतना कुछ लिखने का अर्थ यही है कि कम से कम सावन के मौसम का जमकर आनंद लें। धूप, बारिश, और आसमान पर छाए कारे बदरा के महत्व को भी महसूस करें। कुछ सुकून के पल निकालें इस मौसम के लिए भी। यदि परंपरागत गीत ना जानते हो तो यूट्यूब पर जाकर कम से कम सुन तो सकते ही हैं।
लोकगीतों में भी सावन के अनेक दृश्य हैं। सावन में नववधू को मेहंदी रचाना है तो वह अपने पति से आग्रह करती है–
पिया मेहंदी लिआय दा मोतीझील से
जाय के साइकिल से ना
जाके मेहंदी लिआबा
छोटी ननदी से पिसआवा
अपने हाथ से लगावा
कांटा कील से
सावन में चैता, कजरी, सावन, मल्हार, बारामासी गाए जाते हैं। इनका अपना एक अलग ही रस है। एक कजरी की इन पंक्तियों में राधा रानी से उनकी सखियों की मनुहार है–
राधे झूलन पधारो झुकि आए बदरा
साजो सकल सिंगार नैना सारो कजरा
यह एक झलक भर है साहित्य में सावन की, उसमें होने वाली वर्षा की जो भादो में बहुत तीव्र हो जाती है। बॉलीवुड ने भी सावन के मौसम का काफी हद तक अपने गीतों से लोगों को अवगत करवाया है।
सावन के झूले पड़े, तुम चले आओ..
मेरे नैना सावन भादो....
सावन के झूलों ने मुझको बुलाया..
ऐसे अनेकों गीत हैं जो कि सावन के सुंदर दृश्य को उकेरते हैं, बस जरूरत है कि हम भी उसे महसूस कर सकें। सावन के मौसम में कई सारे कार्यक्रम भी पहले आयोजित हुआ करते थे, लेकिन अब इस पर भी काफी कमी आई है। यह घनघोर चिंता का विषय है कि यदि हम मौसम का आनंद ही नहीं ले सकते हैं, तो भला और किस पल और क्षण का आनंद लिया जाए। बस आज याद आई उस पेड़ पर लगे झूले की तो थोड़ा लिख डाला। आप भी अपने अनुभव साझा कर सकते हैं।
(नोट-कुछ जानकारी इंटरनेट से भी)
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