ठाकुर वीरेंद्र सिंह राजपूत
वैसे तो बेंगलुरु में रहने के दौरान अनेकों साथी बने, लेकिन कई साथी ऐसे बने जिनके साथ आज भी जुड़ाव पहले की तरह ही कायम है। उनमें काफी खास नाम है ठाकुर वीरेंद्र सिंह राजपूत का। काफी समय बाद आज अचानक वीरेंद्र सिंह का फोन सीधे राजस्थान के बाड़मेर से आया। अब बाड़मेर जैसी जगहों से भी यदि आपका कोई साथी आपको याद रख रहा हो तो वास्तव में इससे बड़ी खुशी की बात नहीं है । बेंगलुरु में अक्सर छुट्टी के दिन शाम के वक्त मैं और वीरेंद्र सिंह राजपूत साथ ही नितेश पंजीयार एक साथ मिलकर पार्क में टहलने के लिए पहुंचते थे । वैसे सुबह के दौरान टीम बड़ी लंबी होती थी , लेकिन शाम के समय केवल हम तीन लोग ही रहते थे, क्योंकि ज्यादातर राजाजी नगर के डायमंड विला पीजी में रहने वाले साथी आईटी सेक्टर में कार्यरत थे। वैसे कई बार हेमंत पाठक भैया के साथ भी टहलना हो जाता था, हालांकि वह हम उम्र नहीं थे। यही वजह है कि उनसे केवल सलाह मशवरा लेने का काम ही सभी लोग करते थे। वीरेंद्र और नितेश हम सब करीब- करीब हम उम्र ही रहे, ऐसे में हम सब में काफी बनती थी। यही वजह है कि बाद में मैंने नितेश के साथ रूम भी शेयर किया। ठाकुर वीरेंद्र सिंह राजपूत वैसे तो मूल रूप से राजस्थान के जयपुर से हैं। हालांकि इन दिनों बाड़मेर में ही समय व्यतीत कर रहे हैं। आपके जीवन में ऐसे साथियों का होना भी जरूरी है जो कि आपके जिंदादिली को जिंदा रखते हैं। थैंक्स भाई। वैसे आजकल अपने करीबी साथी शहजाद खान सर भी बाड़मेर में ही हैं और अपने कैमरे का कमल लोगों को दिखा रहे हैं। अब देखा जाए इन सभी साथियों से अगली मुलाकात कब होती है। वैसे नितेश से दिल्ली में मुलाकात हुई थी, उस दौरान साथ में घूमना फिरना भी हुआ था। वह भी आजकल बिहार में ही work-from-home में लगे हुए हैं। उम्मीद है जल कुछ पुराने साथियों से मुलाकात हो। वैसे इस क्रम में सुशील सिंह उर्फ हनी सिंह का जिक्र करना भी जरूरी है ,जो कि हम सबको हमेशा हंसाता रहता था। हालांकि सुशील से भी मुलाकात हुए काफी समय हो चुका है और बात किए भी काफी समय हो गया है। वह कब इस राज्य में है, कब उस राज्य में इसका हम सबको पता नहीं चल पाता था। हाँ यह जरूर पता रहता था कि वह हम सबसे अधिक व्यस्त है। इन सबके बावजूद वह हम सब साथियों से मिलने का समय निकाल लेता था । वीरेंद्र भाई के साथ तो कोई तस्वीर मिल नहीं रही, ऐसे में बेंगलुरु के कुछ दोस्तों के साथ की तस्वीर साझा की जा रही है। वैसे बेंगलुरु में काम करने का श्रेय हमेशा पार्थ भैया को ही रहेगा। उनके प्रयास से ही बेंगलुरु पत्रिका में काम करने का मौका मिला था।धन्यवाद भैयाजी।
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