अपने राजू भैया और उनकी फटफटिया....
राजू भैया को गुजरे कई साल बीत चुके हैं।राजू पंडित के नाम से वह लोगों के बीच काफी मशहूर हुए औऱ हैं और रहेंगे। उनसे जुड़े कई किस्से और कहानियाँ है।यदि यह कहूँ कि पूरे तिवारी खानदान में हमारी पीढ़ी में सबसे जुझारू और तेज तर्रार वही रहे तो गलत नहीं होगा। वह हम सब भाइयों में सबसे बड़े थे। यही वजह है कि जिम्मेवार अधिक थे। वह समझदार भी काफी थे।इस बात का मलाल हमेशा रहा कि उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी काफी देर से मिली।अन्यथा वह शायद हमारे बीच ही होते। वैसे वह हम सबके साथ ही तो हैं। वह कहीं गए नहीं।अक्सर हमें वह गलत काम करने पर डांटते फटकारते और कभी कभी गरियाते भी नजर आते हैं। शायद ऐसा हर किसी को महसूस नहीं हो।शायद मैं उनके कुछ करीब रहा, ऐसा मुझे लगता है,वह शायद नहीं सोचते हों।उन जैसा अब घर में किसी और का होना मुश्किल है। यशोदा लाल मिश्र उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बढ़हरिया से 10वीं और जनता इंटर कॉलेज, निजामाबाद से 12वीं, शिबली कॉलेज से बीएससी की परीक्षा उन्होंने पास की। वह क्या कहते हैं उसे विद फ्लाइंग कलर्स।
12वीं के नतीजे आ चुके थे।उन दिनों नतीजों के लिए उत्तर प्रदेश में शाम को स्पेशल अखबार आता था।अमित भईया चौराहे पर जाकर नतीजा देखने के बाद अखबार लेकर आ गए थे।अब कालेज में दाखिले के लिए आजमगढ़ जाना था। काफी समय तक बड़े भैया साइकिल से ही तकरीबन 35 किलोमीटर तक का सफर उसी साइकिल से करते थे। अचानक एक दिन वह फटफटिया यानी कि हीरो पुक लेकर आए।यह हमारे घर के साथ ही आसपास के लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र था।वैसे थी तो वह साइकिल जैसी दिखने में लेकिन आवाज खूब करती थी।उस समय खेतीबारी भी खूब लहलहाती थी।ऐसे में तड़के सुबह ही राजू भईया, छोटे चाचा, अमित भैया, मुकेश भैया खेत पहुंच जाते थे।अपना काम तो खाली गोबर उठाना था। कुंदन और हम भी कभी कभी खेत जाते थे,बस यूं ही टहलने।राजू भैया रात को लालटेन लेकर पढ़ना शुरू करते थे।सुबह भी पढ़ते हुए मिलते।बड़े पिताजी जब अपने शाहपुर में दुआर को बुहारते थे तब भी वह पढ़ते हुए मिलते। दरअसल राजू भैया कब जागते , कब सोते और कब कालेज चले जाते यह पता नहीं चल पाता था हमें। बाद में फटफटिया की जगह उन्होंने मोटरसाइकिल ले ली थी।जाने से पहले वह कार से चलते थे। उनका विकास तो हुआ, लेकिन शरीर पर उन्होंने शायद ध्यान नहीं दिया या फिर हम सब का पूरा सहयोग व समर्थन शायद उन्हें नहीं रहा। राजू भैया का पूरा नाम वैसे राजीव त्रिपाठी था। उम्मीद भी नहीं कि मैं कभी उन जैसी मेहनत कर पाऊंगा।बस याद आई तो उनका एक संस्मरण साझा कर दिया।अगला संस्मरण फिर कभी। वैसे सबसे अधिक लोग उन्हें ही मानते थे चाहे वह दिनेश चाचा हों, हमारे पिताजी हों, बड़े पापा हों या फिर अखिलेश चच्चा। वह सबके दुलारे रहे।थोड़ी बहुत अनबन तो सबमें होती है, जहां अपनापन होता है।वैसे किसी की आंखें गीली हों तो साफ कहूँ किसी को रुलाना मेरा उद्देश्य कत्तई नहीं। वैसे अब लालटेन और ढेबरी वाला युग तो रहा नहीं और ऐसे संस्करण मिलना तो दूर, सुनना भी मुश्किल ही है।वैसे आज स्मार्ट गैजेट्स ने हमें स्मार्ट तो किया मगर हमारी दुनिया को बिल्कुल अलग थलग कर रखा है। राजू भैया को नमन करते हुए।हम आपको भूले नहीं,भूलेंगे नहीं,आप हमारे दिलों में हैं भैया।वैसे सबसे ज्यादा दादी आपको ही मानती हैं आज भी।
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