मिट्टी से जुड़े रहें

 

ये शहर है अमन का यहाँ की फ़िज़ा है निराली यहाँ पे सब शांति-शांति है...किसी हिन्दी फिल्म का यह गीत काफी समय तक लोगों के जेहन में रहा। दरअसल जब यह गीत आया तो काफी लोकप्रिय रहा।(नोट गीत के खिलाफ कुछ नहीं है, यह मुझे भी काफी पसंद है, बस लेखनी के लिए शब्दों को अपनाया) लोगों ने इसे खूब गुनगुनाया। काफी समय गीत को सुनने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि क्या वास्तव में शहर में शांति है। क्या शहरी जीवन बिल्कुल सुकून भरा है। कम से कम मेरे जैसे ग्रामीण भारत से सशक्त तौर पर आत्मा से जुड़े लोग तो ऐसा नहीं सोचते होंगे। शहरी जीवन में एक तरह से हम रम चुके हैं, लेकिन अब भी यहां की आबो-हवा ने हमें नहीं अपनाया है। जैसे ही हम दो-चार दिनों के लिए ही अपनी जन्मभूमि की धरती पर पहुंचते सुकून व शांति न केवल  नजर आती है, बल्कि प्रतीत होती है। बीमारियां हमसे कोसों दूर रहती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि शहर  की भागती और दौड़ती भरी जिंदगी में आप गांव को भूलते जा रहे हैं। समय-समय पर साल में दो-चार बार गांव की सैर आप कर आते हैं। यह सोचने का समय है कि कब तक यह प्रक्रिया जारी रहेगी। आप या तो अपने शहरी जीवन को ही अपनाकर यहीं शांति व सुकून में रहना व जीना सीख लें, या फिर ग्रामीण भारत के  साथ भी आत्मीयता भरा संबंध जारी रखें। मुझे हमेशा ऐसा लगता है, यूं कहें कि खतरा सा प्रतीत होता है कि शहरी जीवन के चक्कर में दरअसल हम अपनी असल संस्कृति से कोसों दूर होते जा रहे हैं। आज हम अपने शहरी घरों में केवल काफी करीबियों से ही अपनी ग्रामीण बोलचाल भाषा(हमारे यहां आजमगढ़िया) में बात करते हैं। बच्चों से हमने खड़ी बोली में बातचीत शुरू कर दी है। बच्चों के भविष्य के लिए या यूं कहें कि आने वाले दिनों में प्रतियोगितात्मक जीवन के लिए अंग्रेजी शिक्षा भी आवश्यक है, लेकिन उस चक्कर में हम अपनी असल बोली को भूलते जा रहे हैं। शहर में हमने अपने त्योहारों को भी अपने तरीकों से जीना शुरू कर दिया है। गांव में जहां एक साथ त्योहार का पालन आज भी होता है, शहरों में यह केवल सोशल मीडिया व कुछ करीबियों के साथ औपचारिकता भरा पर्व होकर रह गया है। भविष्य खतरे में है। वर्तमान में आप जिंदादिल तो हैं,लेकिन दिल आपका कहां है, यह भी यदा-कदा अवश्य सोचें। ऐसा न हो कि समय की बहती धारा में आप यूं बहते चले जाएं कि अपनों को देखकर ही नमस्कार तक करना भूल जाएं। पैर छूकर नमस्कार करने की परंपरा भी शहरी जीवन से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। गांवों में आप अपनों व अपने रिश्तेदारों के बीच पहुंचकर कम से कम इस संस्कृति तक को तो जीवित रख ही रहे हैं। सोचें, समझें, अपनों व अपनों के साथ रहें। हिल-मिलकर नहीं, दिल से दिल मिलकर। एक-दूसरे के गले लगकर आत्मीयता का बोध कराएं। अपनों को ऐसा प्रतीत हो कि आप उसके साथ हमेशा हैं, सदा के लिए हैं। आप उसके लिए कुछ भी कर सकते हैं। आम के बौर पेड़ों पर लग चुके हैं, ज्यादा न सोचें, एक तूफान या हवा के झोंके में ही यह आधे रह जाएंगे। जीवन भी कुछ ऐसा ही है, आधा तो निभ गया, बाकी और जीवन भी निभ ही जाएगा। बेवजह के तनाव से दूर व्यस्तताओं के बीच भी गांव की तस्वीर को जेहन में जिंदा ही न रखें, बल्कि पहुंचें अपने गांव के लोगों के बीच। आप यहां नमस्कारी ही नहीं करेंगे, नमस्कारी लेंगे भी। मिट्टी से जुड़े रहें।ज्यादा न सोचें बस यूं ही लिख दिया मेरे दोस्त।फिट रहें।चहकते रहें, दमकते रहें।

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