कोयम्बटूर पू मार्केट

 तमिलनाडु और कर्नाटक कभी भी जेहन से नहीं जाता है। कर्नाटक के बेंगलुरु में जाने का मौका केडी पार्थ भैया ने ही दिलवाया था। कभी नहीं सोचा था कि बेंगलुरु जैसे अति व्यस्त और फास्ट शहरों में खासकर आईटी के होनहार लोगों के बीच में जाने का कभी मौका मिलेगा। लेकिन वह मौका भी मिला और बखूबी उसे एंजॉय भी किया गया। कर्नाटक के बेंगलुरु में राजस्थान पत्रिका में काम करने के बाद तमिलनाडु के कोयंबटूर में शुरू हो रहे या शुरू हो चुके पत्रिका के एडिशन में स्थानांतरण के बाद काम करने का मौका मिला। यहां वैसे तो काफी कुछ खास रहा। लेकिन कोयंबटूर अक्सर याद आता है। कोयंबटूर नॉर्थ स्टेशन के निकट ही राहुल शर्मा सर जी के साथ अपना रहना शुरू हुआ थाम बाद में शहजाद खान सर भी अपने साथी बने और तीनों तिकड़ी यहां पर काफी समय तक बस गई। सबकी अपनी-अपनी दिनचर्या थी। वैसे तो कोयंबटूर में काफी कुछ खास रहा लेकिन आर एस पुरम के निकट स्थित पू मार्केट है जिसे की फूलों का बाजार भी कहा जाता है।यह फ्लावर मार्केट काफी मशहूर है और काफी ऐतिहासिक भी। सदियों पुराने फूल बाजार से न केवल कोयंबटूर जिले में बल्कि प्रदेश व यहां तक कि श्रीलंका सहित कई देशों में भी फूलों का निर्यात किया जाता है। वैसे तो इस फ्लावर मार्केट के बारे में राहुल सर ने बहुत शानदार स्टोरी भी लिखी थी। लेकिन अचानक इस फ्लॉवर मार्केट की याद आ गई। इसकी वजह है कि हम लोगों का ऑफिस आरएस पुरम में ही था और यह ऑफिस के नजदीक होने के साथ ही साथ कहीं भी आने-जाने के दौरान हमारे कमरे के आसपास भी रास्ते में पड़ता था। ऐसे में फ्लावर मार्केट से सुगंध लेते हुए हम न गुजरें, ऐसा कभी हो नहीं पाता था। काफी सलीके से यहां पर फूल बाजार लगे हुए हैं। सुबह से लेकर रात तक यहां पर कारोबार का दौर चलता रहता है । फ्लावर मार्केट में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का भी कारोबार में कभी दबदबा है। प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सैकड़ों, हजारों ही नहीं बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि लाखों लोग इससे जुड़े हुए हैं। अचानक इसकी याद आई तो अपने फोन के बदलने के कारण इसकी तस्वीर कोई नहीं मिल सकी। लेकिन वह तो भला हो हमारे संजय सिंह जी दोस्त का जो कि अपने कमरे के निकट ही रहते हैं और शायद अभी भी वहीं रहते हैं। उनसे निवेदन करके हमने वहां की तस्वीर मंगवाई , ताकि उसे फेसबुक पर साझा कर सकें । उन्होंने तस्वीरों के साथ-साथ वीडियो भी भेजा।  गोरखपुर के संजय जी बहुत ही मिलनसार और काफी मेहनतकश व्यक्ति हैं। लंबे समय से वह वहां पर रह रहे हैं और हर साल वहां पर नव दिवसीय दुर्गा पूजा का भी आयोजन यूपी के गोरखपुर ,सुल्तानपुर ,जौनपुर ,देवरिया ,बनारस आजमगढ़ ,गाजीपुर सहित बिहार के कई जिलों के लोग मिलकर करते हैं। इसमें संजय जी काफी बड़ी भूमिका निभाते हैं या यह भी कह सकते हैं कि वह नेतृत्व भी देते हैं। इसमें काफी संख्या में लोग शामिल होते हैं । समय के साथ इसमें काफी बदलाव हुआ है और कई कार्यक्रम भी धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं । इसकी खासियत है यह है कि नवरात्रि के दौरान खासकर शारदीय नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की प्रतिमा बंगाल के कारीगरों से ही तैयार करवाई जाती है। उन्हें संस्था की ओर से आवश्यक जगह और सामान उपलब्ध करवा दिया जाता है और कारीगर यहीं पर मूर्ति का निर्माण करते हैं । वहां रहने के दौरान प्रतिमा निर्माण पर स्टोरी भी की थी । खैर बात हो रही है फ्लावर मार्केट की तो फ्लावर मार्केट वास्तव में काफी खास है और प्रायः सभी प्रकार के फूल यहां पर उपलब्ध हैं। मुझे तो कई बार ऐसा भी लगता है कि बंगाल और तमिलनाडु के लोग फूलों के अधिक नजदीक रहे हैं या रहते हैं और फूलों के प्रति उनका एक अलग ही लगाव है। यह सम्भवतः हमारी संस्कृत में ही रचा बसा है। वैसे बंगाल के फूल भी कोलकाता से राज्य के विभिन्न हिस्सों में भेजा जाता है। मैंने कई बार ट्रेन में भी देखा है कि बिहार से लेकर झारखंड के लोग गुलाब फूल सीजन के दौरान कोलकाता से लेकर जाते हैं। राजस्थान के जयपुर से लेकर यूपी के बनारस तक यहां के गुलाब की काफी मांग है। गुलाब भी ऐसा नहीं है कि केवल लाल गुलाब बल्कि पीला सफेद और गुलाबी गुलाब भी काफी पसंद किया जाता है। वैसे तो गुलाब की प्रजाति के बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है लेकिन गुलाब के फूल कोयंबटूर के फूल मार्केट में भी बड़े पैमाने पर बिकने के लिए मौजूद मिलते हैं। संभव है कि वहां भी इसकी काफी मांग है।  वैसे हमारे कमरे के आसपास से ही नीलगिरी की पहाड़ियां भी दिखती थीं यानी आज भी दिखती ही है। कई बार तो पैदल ही कोयंबटूर नॉर्थ स्टेशन पहुंच जाता था और शाम के समय पहाड़ियों को देखने का आनंद लिया जाता था। पू मार्केट की तस्वीर के लिए संजय जी का बहुत-बहुत आभार आप ऐसे ही निरंतर आगे बढ़ें। वैसे संजय जी की एकं खासियत और भी रही है कि वह अपनी मोटरसाइकिल से ही काम के सिलसिले में ऊटी चले जाते हैं और शाम तक वापस भी आ जाते हैं। कई बार उन्होंने हमें कहा भी कि चलें आपको ऊटी घूमा लाते हैं लेकिन लेकिन वह अवसर नहीं मिल सका। अब देखा जाए की ऊटी जाने का अवसर कब मिलता है, क्योंकि भले ही कोडाईकनाल शहजाद सर के माध्यम से घूम लिया लेकिन ऊटी सपना ही रह गया। वडककम...कोवई बहुत याद आते हो दोस्त।

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