भोजपुरिया माटी...
निक लागे टिकुलिया गोरखपुर के...बस अचानक ये गाना गुनगुना रहा था। किसी ने अचानक कहा कि बिहार से हैं क्या।बड़ा ताज्जुब हुआ। दरअसल भोजपुरी भाषा व लोकगीतों की परंपरा को बनाए रखना चुनौती बनती जा रही है। गीत ही क्या बोली को भी बचाए रखना चुनौती होगी ऐसा कई बार अहसास होता है। हालांकि हम जैसे कुछ थेथर भी हैं जो कि भोजपुरिया आन बान शान को बचाए रखने में कम से कम अपनी भूमिका बनाए और निभाए जा रहे हैं । बालेश्वर जी के इस गीत में प्रायः सभी भोजपुरी क्षेत्रों के नाम आते हैं।गाने में कोई भद्दापन नहीं बस मिठास ही मिठास है। इस भोजपुरी लोकगीतों की परंपरा का वैसे हमारे अनेकों भोजपुरी गायक निर्वहन करते आ रहे हैं। भोजपुरी के सामने चुनौती है लेकिन इससे भी हम पार कर जाएंगे। अब भोजपुरी तो हम प्रशान्त भैया की तरह नहीं लिख सकते। लेकिन बोलना,लिखना,समझना जानते हैं। दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार ना मिले..यह गीत बालेश्वर ही गा सकते हैं। बात बिहार, यूपी,झारखंड, एमपी या किसी विशेष राज्य की नहीं है।हम जहाँ के हैं वहां की बोलचाल की भाषा को बनाए रखें यह जरूरी है। गाँव जवार की खोज खबर भी रखें वरना भोजपुरिया माटी की ...