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मार्च, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बुलबुल आई...

  कुलबुल करती बुलबुल आई, उछल कूद मचाती है, घर आंगन में अपनी बोली से मन को महकाती है। बुलबुल के बच्चे भी अब चिंव चिंव करते हैं, जल्द उछल कूद मचाने की अपनी मां से जिद करते हैं। घर के नए मेहमानों से मन को मिला सुकून है, घोंषले को देखकर ही मन करता है उड़ने। कास हम भी बुलबुल होते, इनके मन की बातों को सुन और समझ तो पाते। बुलबुल की कोलाहल ने घर में नए मेहमानों के साथ बनाया बसेरा है, मानो किसी अपने ही साथ रहते हों। हर घड़ी इनके बारे में सोचकर कुछ करने को मन करता है, मानो अपनों को ही गले लगाकर जीने को जी करता है। इंसानों और पक्षियों में कुछ अंतर समझने की कोशिश करता हूँ, यह घोंषले में ही घर बना लेते हैं,परिवार के साथ रहते हैं। हम घर में ही घोंषला तोड़ते रहते हैं। एक दूसरे के साथ नहीं बल्कि एक दूसरे से दूरियां बनाने में ही जीवन को गुजार देते हैं। बुलबुल तुम जहां भी रहना,उड़ना और उड़ते ही जाना, आसमान के ऊंचे गगन पर मस्त मगन हो विचरते रहना। यहां बहुत तनाव है, बड़ा दबाव है, अपनों में ही अलगाव है, तुम मस्त गगन में मुस्कुराती रहना, हम इंसानों में भी अपनी प्यारी मिठास भरी मिसरी घोलो। आई बुलबुल जबसे घर मे...

जिंदगी का नाम दोस्ती...

दोस्ती का अर्थ क्या है, यह शायद आज तक कोई भी नहीं समझ सका है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि जो आपके आसपास हो, खासकर ऐसे वक्त जबकि आपको उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, शायद यही दोस्ती है। जीवन में कुछ घटनाएं जो कि सामने हुई हों वह कई बार इस दुनियादारी के खोखलेपन के पहलुओं की भी पोल खोलती हैं। वह यह साबित करती हैं कि आज भी समाज हमसे और आपसे व अपनों से ही बना है। ऐसी घटनाएं एक बार फिर से साबित करती हैं कि आज भी बड़ी ही जीवटता के साथ काफी संख्या में ऐसे लोग हैं जो कि जीवन को सही मायने में जी रहे हैं। हमारे मौसी के ससुर जी हैं जिन्हें कि हम सब बाबा रामजन्म चौबे या फिर कुनमुन बाबा के नाम से जानते हैं। वैसे मैंने शुरू से ही उन्हें बाबा ही कहा है। दूसरी तरफ हमारे अपने गांव के ठाकुर साहब हैं जिन्हें कि हम सब वरिष्ठता के आधार पर बाबा ही कहते हैं। ठाकुर रामकेर सिंह। यह भी कहा जा सकता है कि आसपास के कई गांव में सबसे बड़े वयोवृद्ध आज वही हैं। इन दोनों ही बाबा के पास जीवन के अनेकों अनुभव हैं। दोनों ही आज नाती पोते से लेकर परपोते तक को अपने सामने चहल-पहल करते हुए देख रहे हैं। ज्ञान का असीम भंडार इनके पास भ...

समय निकालें अपनों के लिए

 जीवन उलझनों से घिरा है। हर व्यक्ति उलझा है। जीवन की अजीब पहेलियों को सुलझाने को प्रयासरत है। जीवन की इस आपाधापी में यदि समय मिले तो जमकर आनंद लेने की जरूरत है। लेकिन आनंदरस में इतना न डूब जाएं कि फूफा और जीजा को भूल जाएं। वैवाहिक समारोहों में अक्सर अपने यानी कि नाते रिश्तेदारों का आवागमन तो होता ही है। अब भी यही देखा जाता है कि किसके वैवाहिक समारोह में कितने नात बांत और किन किन शहरों से पहुंचे। खैर इसके बाद बात आती है खातिरदारी की। यदि डीजे न हो तो आजकल के बाराती नाचने को भी तैयार नहीं होते। नागिन डांस पर नाचने की परंपरा अब कम हो गई है। अब तो किसी चलतू भोजपुरिया पर जमकर ठुमके लग रहे हैं। ठीक भी है गाना भले ही समझ के बाहर हो लेकिन नाच के लिए परफेक्ट हो जाता है। बात हो रही है जीजा और फूफा की तो भैया इनकी आवभगत में कमी न रखें। ज्यादा भौकाल न बांधें। सीधे और सपाट बात करें। व्यवस्था टाइट रखें। हो सके तो किसी एक को इनकी सेवा में ही लगा दें। वजह यूं है कि कोई दिल्ली तो कोई मुंबई से नौकरी से कुछ समय की छुट्टी लेकर आता है।उसके समय की कद्र करें। मैं यहां किसी की आलोचना नहीं कर रहा बस एक सन्...

लुप्त होती परम्पराएं

 लुप्त होती परंपराएं... हदिस चचा नाऊ का काम सालों से कर रहे हैं। उन्हें अब संख्या ज्ञात नहीं है कि उन्होंने कितने वैवाहिक समारोहों में शिरकत की है। साथ ही पूरे शादी के मंडप में एक अग्रणी भूमिका निभाई है। आज हदिस चचा जैसे लोगों की काफी कमी नजर आ रही है। ऐसा इसलिए कि किसी जमाने में हर गांव के हर घर के अपने नाऊ हुआ करते थे। लेकिन अब आधुनिकता ने इस पुरानी परंपरा को धीरे-धीरे से लुप्त करने का काम शुरू कर दिया है। समय के साथ गांवों में भी आधुनिकता की छाप पड़ी है। ऐसे में परंपरागत घरों के हदिस चचा जैसे लोग अब नहीं मिल रहे। आलम यह है कि कई बार वैवाहिक कार्यक्रमों में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए ऐसे लोगों को लोग ढ़ूंढ़ते ही रह जाते हैं। किसी समय वैवाहिक समारोहों में इनका इंतजार रहता था। काफी लोग इनके घर आने के बाद ही कई कार्यक्रम आगे बढ़ाते थे। साथ ही समारोहों में परजा की संख्या काफी अधिक यानी कि 10 से लेकर 16 तक होती थी। लेकिन अब यह संख्या इक्का-दुक्का ही बची है। परजा के हर समुदाय के लोगों की अपनी-अपनी अलग-अलग जिम्मेवारियां वैवाहिक समारोह में होती थी। हदिस चचा बताते हैं कि दरअसल अब लोग शहर...