लुप्त होती परम्पराएं
लुप्त होती परंपराएं...
हदिस चचा नाऊ का काम सालों से कर रहे हैं। उन्हें अब संख्या ज्ञात नहीं है कि उन्होंने कितने वैवाहिक समारोहों में शिरकत की है। साथ ही पूरे शादी के मंडप में एक अग्रणी भूमिका निभाई है। आज हदिस चचा जैसे लोगों की काफी कमी नजर आ रही है। ऐसा इसलिए कि किसी जमाने में हर गांव के हर घर के अपने नाऊ हुआ करते थे। लेकिन अब आधुनिकता ने इस पुरानी परंपरा को धीरे-धीरे से लुप्त करने का काम शुरू कर दिया है। समय के साथ गांवों में भी आधुनिकता की छाप पड़ी है। ऐसे में परंपरागत घरों के हदिस चचा जैसे लोग अब नहीं मिल रहे। आलम यह है कि कई बार वैवाहिक कार्यक्रमों में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए ऐसे लोगों को लोग ढ़ूंढ़ते ही रह जाते हैं। किसी समय वैवाहिक समारोहों में इनका इंतजार रहता था। काफी लोग इनके घर आने के बाद ही कई कार्यक्रम आगे बढ़ाते थे। साथ ही समारोहों में परजा की संख्या काफी अधिक यानी कि 10 से लेकर 16 तक होती थी। लेकिन अब यह संख्या इक्का-दुक्का ही बची है। परजा के हर समुदाय के लोगों की अपनी-अपनी अलग-अलग जिम्मेवारियां वैवाहिक समारोह में होती थी। हदिस चचा बताते हैं कि दरअसल अब लोग शहरी आबोहवा के चक्कर में परजा प्रथा के बारे में तो बिल्कुल कम जानते हैं। कुम्हार से लेकर कोंहार, नाऊ से लेकर नाऊन किस प्रकार से वैवाहिक समारोहों में शामिल होते थे, यह पहले के लोग ही जानते थे। अब तो सबकुछ चटपट यानी कि काफी जल्दबाजी में होता है। हल्दी, मटमंगरा से लेकर मेहंदी सहित कई कार्यक्रम यानी कि रस्म अदायगी एक ही दिन में खत्म कर दिए जाते हैं। ऐसे में अब पहले जैसी रौनक काफी कम नजर आती है। फ्लोर डीजे पर लोग थिरककर थकान महसूस करने लगते हैं। बारातियों की संख्या भी कम हो रही है। अपनों में ही अपनापन कम नजर आता है। फुफा के लड़के का लड़का, मामा के लड़के का लड़का, ननिहाल के घर के लोग, फुफा का लड़का, फुआ, मौसी, मामी, मामा सहित केवल कुछ नजदीक रिश्तेदार ही वैवाहिक समारोहों में शामिल हो पाते हैं। आलम तो यह है कि कई लोग विवाह समारोह के दिन पहुंचते हैं और अगले ही दिन रफूचक्कर हो जाते हैं। मानो उन्होंने समारोह में शामिल होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने का कर्त्तव्य निभा लिया है। लेकिन कई लोगों के घराने इस मामले में काफी खुशनसीब भी हो रहे हैं। उनके यहां नाते रिश्तेदारों की भीड़ देखते ही बनती है। वैसे परजा परंपरा का कम होना एक चिंता का विषय बन रहा है। इसके अलावा वैवाहिक समारोह में देर रात तक माड़ो (बांस के बने शादी के मंडप) में बैठने वालों की संख्या भी कम हो रही है। वैवाहिक गीतों की परंपरा ने तो लोगों से मानो दूरियां बना ली हैं।
भीड़ का हिस्सा न बनें बल्कि हक से अपनों के कार्यक्रमों में शामिल होने की आदत डालें। इस बार पीयूष और आयुष जैसे दो युवा साथियों से मिलकर ऐसा ही लगा कि जीवन में आनंद लेने के लिए जगह ढूंढ़ ही ली जाती है।समय निकालिए दोस्त आप भी वरना केवल पछतावा रहेगा और समय काफी पीछे छूट जाएगा। वैसे एक वर्ग ऐसा भी है जो कि कार्यक्रमों में शामिल होने के बाद भी इधर-उधर कतराता नजर आता है। बाद में यही वर्ग शिकायत भी करता है कि हमें सम्मान नहीं मिला, महत्व नहीं मिला, किसी ने पूछा नहीं। लेकिन दरअसल यही वर्ग है जो कि अपने समय अनुसार सारा काम करता है। ऐसे लोगों पर जरूर से नजर रखें। परंपराओं को जीवित रखना हम पर और आप पर ही निर्भर है। हमेशा समय निकालें अपने कीमती समय से सबके लिए अन्यथा धीरे-धीरे आपकी पूछ भी शायद ना हो। मुंह मत फुलाइये बल्कि चाट और फुल्की का आनंद लेते हुए मुस्कुराइये। थोड़ा नागिन डांस पर थिरकिये। तो चलिये नासिरपुर के हदीस चचा की जय कहिए...
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