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मिट्टी से जुड़े रहें

  ये शहर है अमन का यहाँ की फ़िज़ा है निराली यहाँ पे सब शांति-शांति है...किसी हिन्दी फिल्म का यह गीत काफी समय तक लोगों के जेहन में रहा। दरअसल जब यह गीत आया तो काफी लोकप्रिय रहा।(नोट गीत के खिलाफ कुछ नहीं है, यह मुझे भी काफी पसंद है, बस लेखनी के लिए शब्दों को अपनाया) लोगों ने इसे खूब गुनगुनाया। काफी समय गीत को सुनने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि क्या वास्तव में शहर में शांति है। क्या शहरी जीवन बिल्कुल सुकून भरा है। कम से कम मेरे जैसे ग्रामीण भारत से सशक्त तौर पर आत्मा से जुड़े लोग तो ऐसा नहीं सोचते होंगे। शहरी जीवन में एक तरह से हम रम चुके हैं, लेकिन अब भी यहां की आबो-हवा ने हमें नहीं अपनाया है। जैसे ही हम दो-चार दिनों के लिए ही अपनी जन्मभूमि की धरती पर पहुंचते सुकून व शांति न केवल  नजर आती है, बल्कि प्रतीत होती है। बीमारियां हमसे कोसों दूर रहती हैं। यह भी कहा जा सकता है कि शहर  की भागती और दौड़ती भरी जिंदगी में आप गांव को भूलते जा रहे हैं। समय-समय पर साल में दो-चार बार गांव की सैर आप कर आते हैं। यह सोचने का समय है कि कब तक यह प्रक्रिया जारी रहेगी। आप या तो अपने शहरी जीवन को...

नहीं मिल रहे खेतीहर कामगार

खेती व किसानी ही हमारे देश की रीढ़ की हड्डी है। ऐसे में किसानों के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकारों ने अलग-अलग योजनाएं पेश की हैं। हर साल ही खेती के साथ ही किसानों के हितों का ध्यान सरकारें अपनी बजट में रखती हैं। इस बीच सोचने वाली बात है कि अचानक काफी जगहों पर खेतीहर कामगारों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसकी अलग-अलग वजहें लोग बता रहे हैं। एक वरिष्ठ उद्योगपति ने बातों ही बातों में बताया कि काफी समय से विशेषकर कोविड महामारी के बाद सरकारों ने अनाज निःशुल्क देना शुरू कर दिया। ऐसे में राशन निःशुल्क मिलने लगा। हालांकि सबसे बड़ी परेशानी दिखी अनाज के बाद उसे पकाया कैसे जाए?इसकी वजह है कि इसके बाद ईंधन से लेकर तेल, मसाले तक की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद इन सबका भी जुगाड़ लोगों ने कर लिया। देखा जा रहा है कि खेतीहर कामों के लिए कामगार मिलना हाल के वर्षों में काफी मुश्किल साबित हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ता अजय कुमार झा ने कहा कि दरअसल काफी लोगों को काफी योजनाएं निःशुल्क मिल रही हैं। इससे लोगों में काम कम करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है। संभव है कि यह भी एक वजह है कि कामगार अब कम मिल प...