तस्वीर बदलनी चाहिये
भारतीय रेलवे की परिसेवा में अब भी कई जगहों पर चिर परिचित तस्वीर नजर आती है। उदाहरण के तौर ट्रेन के प्लेटफार्म पर पहुंचने के पहले ही अब भी रेल यात्रियों में ट्रेन में सवार होने को लेकर अनुशासन नदारद है। यात्री इस कदर टूट पड़ते हैं कि ट्रेन ठहर नहीं सकती,वह भाग जाएगी। वैसे है तो ऐसा ही लेकिन ट्रेन का समय निर्धारित है। इस तरफ यदि चाहें यात्री जागरूक रहकर तय समय से ट्रेन पकड़ सकते हैं। दूसरी तरफ ट्रेनों की संख्या बढ़ी है लेकिन यात्रियों की जनसंख्या के आधार पर यह अब भी शायद नाकाफी है। तस्वीर काफी भयावह और चौंकाने वाली है। आरक्षित डिब्बों में अनारक्षित यात्री यात्रा करने को मजबूर हैं। आखिरकार सबको ट्रेन यात्रा से ही मंजिल तय करनी है। इधर रेल आधुनिकीकरण का काम चल रहा है। इस कारण ओडिशा की काफी ट्रेनें रद्द हैं। यात्री अधिक जुर्माना देकर यात्रा करने को तैयार हैं। इस क्षेत्र में यह उपाय हो सकता है कि भारतीय रेलवे की तरफ से अतिरिक्त ट्रेन ऐसे रूटों पर संचालित की जाएं जहाँ कि यात्री अधिक हैं। तस्वीर और बेहतर हो सकती है। दूसरी तरफ ट्रेनों में आरपीएफ कर्मियों की मौजूदगी को अनिवार्य बनाया जा सकता ह...