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वक्त बदलेगा जरूर

 जिंदगी ठहरती नहीं।चलती रहती है।किसी के साथ भी।किसी के छूटने के साथ भी।यही तो जिंदगी है।शायद यही वजह है कि इसका नाम जिंदगी है।जिंदगी जिंदादिल का नाम है।जो।साथ हैं,सब अपने हैं।जो छूट गए या आपको छोड़ गए वह भी अपने हैं।बस सबके जीने के मायने बदल गए।कुछ आपको सीखा गए।कुछ को आपने सीखा दिया।जिंदगी पर रंज करने का कोई अर्थ नहीं है।क्योंकि जीना इसी का नाम है।इस जीवन को ही जो आपका यह समय है उसी को लेकर चलना है।यह चलता रहता है।चलता रहेगा।इसे खुशमिजाजी से जिएं।कई अपने पीछे छूट गए हैं, या आपको उन्होंने इस्तेमाल किया है,उन्हें याद रखें।वक्त का दौर फिर बदलेगा।उनकी अच्छी बातों को याद रखें। यह वक्त है।यह यूं ही ठहरा नहीं रहेगा। जीवन की अविरल धारा बहती रहेगी। यह कभी ठहरेगी नहीं। जो साथी कल साथ थे वह आज भी साथ ही हैं।बस हम सबकी व्यस्तता बढ़ी है। हम एक दूजे के संपर्क में नहीं हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि हम साथ नहीं है।सब अपने हैं।एक बार पूछ कर तो देखिए।बदलते मौसम की तरह यह वक्त भी बदलेगा।हवा के झोंकों को सब महसूस करते होंगे। कोई एक ऐसा हवा का झोंका आएगा जरूर, फिर हम सब एक होंगे। उसी सही वक्त का इंतजार करें।...

जीवन...

 आप लाख नकारात्मकता भरी दुनिया में जी रहे हों लेकिन सकारात्मकता वाले लोग भी यहीं भरे पड़े हैं। यदि आपके आसपास नकारात्मक विचारधारा के लोग हैं, तो उसके विपरीत सकारात्मक विचारधारा के लोग भी मौजूद हैं। कई बार लोगों से विश्वास अडिग नहीं हो पाता यानी कि विश्वास करने में समय लगता है। लेकिन जहां अविश्वास मन में घर करता है ,तुरंत विश्वस्त लोग सामने आकर धमक जाते हैं या यूं भी कहे कि कुछ ऐसा कर जाते हैं की नकारात्मकता विचार तो दूर अविश्वास की भावना भी आसपास नहीं फटकती है। दरअसल आपके आसपास ऐसे अपनों और मित्रों का होना बहुत जरूरी है। ऐसा अक्सर महसूस होता है कि इस मामले में काफी सौभाग्यशाली हूं कि उच्च विचार वाले व हमेशा सकारात्मक रहने वाले अपने व करीबी मित्र मिले हैं। वैसे कुछ अपनों ने अच्छा सबक भी दिया है, इससे काफी सीख भी मिली है, लेकिन ऐसे भी अपने हैं जो कि दृढ़ता के साथ सभी प्रकार के निर्णय में साथ खड़े हैं। उन्होंने कभी भी अपने को हारने नहीं दिया है। शुरू से ही जीतने की प्रवृत्ति रही है। ऐसे में पॉजिटिव ऊर्जा वाले दोस्तों का साथ इस जीत के स्वाद को और बेहतर बनाता रहा है। ईश्वर सभी को सद्बुद्...

अपनापन...

 काश कोई अपनों का भी शहर होता... शहर में क्या सब बेगाने हो जाते हैं। क्या अपनापन दूर हो जाता है। गांव से निकलकर आए हम सब बसे इस शहर में क्या अपनापन इस कदर भूल जाते हैं कि हमें सपनों के शहर में अपनों की खोज करनी पड़ती है।क्या सच में ऐसा है या केवल यह मिथ्या है। हमारी और आपकी मनगढ़ंत बातें हैं या केवल यह ढकोसला है। ऐसा क्या है कि हमें अपने अपनों को ढूंढने के लिए बार-बार गांव का ही रुख करना पड़ता है। गांव की बात ही निराली है। कुछ तो है जो खींचती है, बुलाती है। वहां की हरियाली, वहां के खेत, वहां की नहर, वहां की रेत, वहां की नदी, नदियों की बहती अविरल धारा। वह चौराहा,शाहपुर, रामपुर, निजामाबाद, नेवादा और शायद अपनों से किया हुआ वादा। शहर के हो चुके हम शायद गांवों में ही अपनों के बीच जिंदगी ढूंढने जाते हैं। ऐसा लगता है मानो इस भागमभाग भरी जिंदगी में ठहराव शायद उसी गांव में ही है।अपने शायद वही हैं। भले ही हम शहर में भी अपनों के बीच में ही हैं। यहां भी सभी अपने ही हैं, लेकिन कुछ तो है कि लाख छल कपट के बावजूद मन वहीं जाने को विवश हो जाता है। लाचार हो जाता है। लंबा समय होने पर मन भारी होता जाता...