अपनापन...

 काश कोई अपनों का भी शहर होता...

शहर में क्या सब बेगाने हो जाते हैं। क्या अपनापन दूर हो जाता है। गांव से निकलकर आए हम सब बसे इस शहर में क्या अपनापन इस कदर भूल जाते हैं कि हमें सपनों के शहर में अपनों की खोज करनी पड़ती है।क्या सच में ऐसा है या केवल यह मिथ्या है। हमारी और आपकी मनगढ़ंत बातें हैं या केवल यह ढकोसला है। ऐसा क्या है कि हमें अपने अपनों को ढूंढने के लिए बार-बार गांव का ही रुख करना पड़ता है। गांव की बात ही निराली है। कुछ तो है जो खींचती है, बुलाती है। वहां की हरियाली, वहां के खेत, वहां की नहर, वहां की रेत, वहां की नदी, नदियों की बहती अविरल धारा। वह चौराहा,शाहपुर, रामपुर, निजामाबाद, नेवादा और शायद अपनों से किया हुआ वादा। शहर के हो चुके हम शायद गांवों में ही अपनों के बीच जिंदगी ढूंढने जाते हैं। ऐसा लगता है मानो इस भागमभाग भरी जिंदगी में ठहराव शायद उसी गांव में ही है।अपने शायद वही हैं। भले ही हम शहर में भी अपनों के बीच में ही हैं। यहां भी सभी अपने ही हैं, लेकिन कुछ तो है कि लाख छल कपट के बावजूद मन वहीं जाने को विवश हो जाता है। लाचार हो जाता है। लंबा समय होने पर मन भारी होता जाता है, कुछ तो है कि हम सपनों के शहर से दूर होकर गांव की ओर अपनापन ढूंढने की कोशिश करते हुए भागते नजर आते हैं। गाँव छोड़कर क्या चले आए हम, सबकुछ बेगाना सा लगता है।सबकुछ होते हुए भी बहुत कुछ खोया खोया सा लगता है। या यूं ही कहूं कि मैं ही शायद खोया खोया सा रहता हूं। गांव तो वहीं है,वहीं है पेड़ की डालों पर डले सावन के झूले।रातों को टिमटिमाते तारे,जुगनू भरी रातें, वो सबकी प्यारी बातें।चलो वहीं बनाएं आशियाना कि ये शहर कुछ बोझिल सा लगता है।हर कोई यहां मानो कुछ बेघर सा लगता है।ख्वाहिशें हैं कि पूरी नहीं होती, सपने हैं कि सोने नहीं देती,अपने हैं कि बेगाने से लगते हैं।शहर है कि छांव ढूंढता फिरता है,उधर गांव है कि हर तरफ छांव ही छांव है।अपनों के बीच भी बेगाने से लगते हैं हम सब।गांव का अपनापन बुलाता है,शहर का अपनापन जाने नहीं देता। 

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