जिंदगी का नाम दोस्ती...
दोस्ती का अर्थ क्या है, यह शायद आज तक कोई भी नहीं समझ सका है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि जो आपके आसपास हो, खासकर ऐसे वक्त जबकि आपको उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, शायद यही दोस्ती है। जीवन में कुछ घटनाएं जो कि सामने हुई हों वह कई बार इस दुनियादारी के खोखलेपन के पहलुओं की भी पोल खोलती हैं। वह यह साबित करती हैं कि आज भी समाज हमसे और आपसे व अपनों से ही बना है। ऐसी घटनाएं एक बार फिर से साबित करती हैं कि आज भी बड़ी ही जीवटता के साथ काफी संख्या में ऐसे लोग हैं जो कि जीवन को सही मायने में जी रहे हैं। हमारे मौसी के ससुर जी हैं जिन्हें कि हम सब बाबा रामजन्म चौबे या फिर कुनमुन बाबा के नाम से जानते हैं। वैसे मैंने शुरू से ही उन्हें बाबा ही कहा है। दूसरी तरफ हमारे अपने गांव के ठाकुर साहब हैं जिन्हें कि हम सब वरिष्ठता के आधार पर बाबा ही कहते हैं। ठाकुर रामकेर सिंह। यह भी कहा जा सकता है कि आसपास के कई गांव में सबसे बड़े वयोवृद्ध आज वही हैं। इन दोनों ही बाबा के पास जीवन के अनेकों अनुभव हैं। दोनों ही आज नाती पोते से लेकर परपोते तक को अपने सामने चहल-पहल करते हुए देख रहे हैं। ज्ञान का असीम भंडार इनके पास भरा पड़ा है। दोनों को ही खेत और खलिहान से काफी लगाव है। लगाव भी क्या कहें, कहा जा सकता है कि खेत के बिना यह और इनके बिना खेत खलिहान अधूरे हैं। वैसे भी आजकल खेती किसानी जो कि काफी मेहनत का काम है,उससे कि युवा पीढ़ी भागने की कोशिश कर रही है। यही वजह है गांव में बड़े पैमाने पर शहरों की ओर जाने का पलायन शुरू हो चुका है। यह पलायन तेजी से हो रहा है और भविष्य में भी और तेजी आने की पूरी संभावना प्रबल तौर पर बनी हुई है। खैर बात हो रही है खेती खलिहानी की तो दोनों ही बाबा ने अपने-अपने मेहनत से खेत और खलिहान से ही परिवार को हरा भरा किया और समृद्धि लाकर परिवार को आज समृद्ध बनाया। यह दोनों ही हम सबके लिए एक बड़े प्रेरणा स्रोत हैं। यह प्रसंग आज इसलिए उठा क्योंकि इस बार अपने मौसी की बड़े पुत्र यानी कि अपने हरदिल अजीज भाई भोलू के वैवाहिक कार्यक्रम में पहुंचना हुआ था। करीब 3 साल बाद गांव जाने का प्लान बना था। पहले ही योजना बनाई गई थी कि इस बार अपने घर पर कुछ समय व्यतीत किया जाएगा। लेकिन वैवाहिक कार्यक्रम की व्यस्तता कुछ ऐसी रही कि शाहपुर में केवल एक रात्रि ही व्यतीत कर सका। वैसे सबसे बड़ा कारण इस बार कुंदन गुरु का घर पर ना रहना भी था। इस बीच गांव जाने के लिए जब हम सब निकले थे, तो अचानक बाबा यानी कि रामजन्म चौबे बाबा ने अपने परम मित्र ठाकुर रामकेर सिंह से मिलने की इच्छा जताई। यह सुनकर थोड़ा आश्चर्य तो हुआ लेकिन इस बात की भी काफी खुशी हुई की उम्र के इस पड़ाव पर भी दोनों ही लोगों की दोस्ती आज भी पहले की तरह ही बरकरार है। तकरीबन सैकड़ा के करीब दोनों ही बाबा आज पहुंच रहे हैं। लेकिन उनके मित्रता की एक मिसाल सबके सामने दी जा सकती है। हमारे बाबा कुनमून चौबे को लेकर हम सब शाहपुर आ गए। वैसे यह दूरी करीब 60 से 70 किलोमीटर की थी। मऊ जिले से हमें आजमगढ़ जिले में आना था। पहुंचते ही सबसे पहले उन्होंने बाबा ठाकुर साहब से मिलने की इच्छा जताई। दोनों एक दूसरे के गले लगे। घण्टों ही दोनों मित्रो में पुरानी बातें होती रहीं। वैसे जब इतने पुराने मित्र सालों बाद मिलें तो बतियाने को काफी कुछ रहता है। वैसे भी मित्रता की ऐसी मिसाल आने वाले समय में हम दे सकेंगे, यह एक बड़ा विषय रहेगा। कई बार ऐसी मित्रता से मुझे ईर्ष्या भी होती है क्योंकि मित्र तो काफी हैं जो कि हमेशा सुख-दुख में साथ खड़े रहते हैं। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आकर हमें भी ऐसी ही जीवटता रहेगी इसमें कई बार संशय सा लगता है। अपने दोनों बाबा की दोस्ती यूं ही कायम रहे। दोनों ही अपनी मेहनत व लगन से लोगों के लिए प्रेरणा बने रहें यही कामना है। कृपया दोनों की छड़ी न देखें। देखें उनके मन के भाव जिसने कई पुरानी यादों को फिर से एक बार जिंदा कर दिया होगा। ऐसी ही दोस्ती हम सबको मिले दोस्तों।
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