खुटहना
खुटहना शाहपुर व रामपुर के साथ ही नेवादा के लोगों को भी काफी पसंद वाली जगहों में है। भला हो भी क्यों नहीं।आसपास के गांवों में ऐसी सुनसान और खाली जगह जो नहीं है। अपने पशुओं को हरी घास खिलाने के लोग इधर का ही रुख करते हैं। युवाओं की टोली तो क्रिकेट सहित अन्य खेलों का आनंद भी लेती है। यह अलग बात है कि इसकी संख्या भी कम है। कमबख्त मोबाइल व सोशल मीडिया ने खेलों पर भी कब्जा कर लिया है। नीलगाय जिसे गंवई भाषा में लीलगाय भी बच्चे और बड़े कहते हैं। इनकी बहुतायत है।खासकर खेतों की फसलों को नुकसान करने में इनकी बड़ी भूमिका रहती है। शायद इस कारण भी इस तरफ लोग फसल बुवाई से बचना ही चाहते हैं। अब भला दिनरात देखभाल कौन करे। ऐसे पशुओं से लोहा लेना भी कम बात नहीं है।एक बार भगाने के साथ ही फिर से बार बार झुंड में आकर यह फसलों को नुकसान करते ही हैं।अब भला सरकारें भी करें तो क्या करें। सुनसान खुटहना में अक्सर ही खेत बंजर ही पड़ा रहता है। ईंट भट्ठी सहित अन्य कामों के लिए खेतों को लोग देने लगे हैं। समय के साथ बदलाव तो हुआ है,लेकिन शायद नाकाफी है। खेत तक जाने के रास्ते हो गए हैं। नहर में पानी भी समयानुसार आता ही है, सिंचाई के समय। लहलहाती फसलें भला किसे नहीं भाती पर खेतों में उपज होना टेढ़ी खीर है।
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