तो चलिए चलते हैं दिल्ली...

बात बहुत ज्यादा पुरानी नहीं है। बस यूं समझिए कि टेलीफोन तो था लेकिन मोबाइल नहीं था। अपने हाथ में मोबाईल फोन नहीं था , लेकिन घर पर फोन जरूर था। जहां फोन करना था वह पड़ोसी के घर में था। घर पर टेलीफोन लगवाने के पहले एसटीडी बूथ से ही काम चलता था। खासकर कम पैसे में बात करने के लिए या यूं कहें कि बिल कम उठे, तड़के सुबह या फिर देर रात लाइन लगानी पड़ती थी। अब इसे ज्यादा समय नहीं हुआ, यह तो बस यूं समझिए कि आँखों के सामने का ही दृश्य तो है। साल 2005 में हिस्ट्री ऑनर्स के नतीजे आ चुके थे।ऑनर्स की डिग्री मिल चुकी थी। ऐसे में यह साफ था कि पिताजी बाहर भेजने की फिराक में लग जाएंगे। वैसे 12वीं पास करने के बाद भी पिताजी की इच्छा थी कि मैं इलाहाबाद जाकर पढ़ाई करूँ। लेकिन अब जब लिखा था यहीं पढ़ाई करना तो भला इलाहाबाद क्यों जाते। इलाहाबाद में झूसी में कमरे के लिए पिताजी पैसा भी दे आए थे, लेकिन मैं वहां पहुंचा ही नहीं। हिस्ट्री ऑनर्स के रिजल्ट के पहले ही दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू), जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी(जेएनयू) में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा देने के लिए फॉर्म फिल अप कर चुका था। इधर हिस्ट्री ऑनर्स का रिजल्ट निकला उधर तीनों ही जगहों से इंट्रेंस एग्जाम की डेट भी आ गई। उसी दौरान पॉलीटिकल ऑनर्स की मित्र रितु की शादी की डेट भी पड़ी थी। यह तय था कि यह डेट हाथ से छूटने वाली है। आंटी जी ने निमंत्रण पत्र दिया था, लेकिन वहां पहुंचना संभव नहीं था। ऐसे में सभी दोस्तों को पहले ही आगाह कर दिया था कि कृपया सभी लोग समय से वैवाहिक कार्यक्रम में जरूर से शामिल हो जाएं। सभी बकायदा शामिल हुए भी। लेकिन वहां मैं नहीं था। मैं दिल्ली की ट्रेन में सवार हो चुका था। पिताजी ने साफ कहा था कि यही ट्रेन है। सबको अपना डेस्टिनेशन तय करना पड़ता है। वैसे इससे पहले कई बार ट्रेन में सवार हो चुका था, लेकिन ज्यादातर समय जनरल डिब्बे में ही गया था। इस बार मौका मिला था स्लीपर क्लास में बैठने का। 2 दिन की यात्रा थी। ऐसे में पहली बार जाने के दौरान थोड़ा मन में भय भी था। वह भी देश की राजधानी दिल्ली जाना था, तो भय और बढ़ चुका था। आखिरी बार पूनम दीदी से पत्राचार हुआ था अंतरदेसी के माध्यम से ही शिबु भैया के बारे में जानकारी मिली थी। वैसे उनसे फोन पर बात हो चुकी थी और ट्रेन के बारे में जानकारी दे दी गई थी। पूर्वा एक्सप्रेस उस समय तड़के सुबह नहीं छूटती थी, बल्कि थोड़ी और देर से हावड़ा से रवाना होती थी। मां ने 2 दिन की यात्रा के लिए खाने पीने का भरपूर इंतजाम कर दिया था ।इसमें दोहती भी बना कर दी गई थी। दोहती यानी कि देश घी से बनी रोटी या यूं कहें परोठा नुमा खाना जो कि यदि चाहे तो कम से कम 1 सप्ताह तक तो चल ही सकता था। इसके अलावा ठेकुआ, नमकीन , बिस्किट और मिठाई तो थी ही। ट्रेन की यात्रा में सबसे बड़ा संभल मां और पिता का आशीर्वाद था। ट्रेन समय से चल दी और पहुंचना था दिल्ली। वैसे पता भी अपने पास रखा था, ताकि यदि शिबू भैया सुबह नहीं पहुंचे तो मैं खुद ही घर तक पहुंच जाऊं। अब तो दिल्ली में रहने के अनेकों ठिकाने हो चुके हैं, लेकिन उस दौरान एकमात्र बुआ ही दिल्ली में अपनी थीं। दिल्ली में सुबह ट्रेन के पहुंचने के साथ ही शिबू भैया पहले ही पहुंच चुके थे। उन्हें मेरे कपड़े के ड्रेस अप के बारे में और हुलिया के बारे में पहले ही बता दिया गया था। अब के हुलिया और तबमें काफी जमीन आसमान का अंतर है और शिबू भैया के बारे में भी मुझे बता दिया गया था। उन्हें देखते ही मैंने पहचान लिया। आशीर्वाद लेने के बाद दोनों ही बाहर निकले और शायद तीन सौ सात नंबर की बस हमने पकड़ी थी। दिल्ली पहुंचने के बाद मन नहीं लग रहा था। कॉलेज से निकलने के बाद अचानक दिल्ली जैसे शहर में पहुंचना वास्तव में बेमन होने वाली बात ही थी। मन से बिल्कुल इच्छा नहीं थी कि एम.ए. में दाखिला किसी भी यूनिवर्सिटी में हो जाए ,इसलिए बे-मन से ही तीनों जगहों पर परीक्षा दे दी थी। कई जगहों पर कई मेरिट लिस्ट निकलती है, लेकिन उसका इंतजार नहीं किया।जल्दी ही दिल्ली से मन भर गया और मैं फिर वापस आ पहुंचा अपने हावड़ा। वैसे शिबू भैया और पूनम दीदी का भरपूर सहयोग दिल्ली में रहा । एक चीज सीखी वहां कि यहां मैं बड़ा हूं और बड़ा था, लेकिन वहां दोनों ही मुझसे बड़े थे। ऐसे में थोड़ा डांट फटकार तो लगनी थी लेकिन काफी कुछ सीखने को मिला। बड़ा होना अपने आप में ही एक बड़ी जिम्मेवारी है। शिबु भैया से काफी कुछ सीखा। आज भी उनकी कई सारी चीजें प्रेरणा देती है। भले ही वह तमिलनाडु जैसे शहर में है, लेकिन दूरियों ने कभी हमें अलग नहीं किया। आज भी याद है कि कैसे हम दिल्ली में देर रात खाना खाने के बाद पार्क में टहलने जाते थे, रात को आइसक्रीम भी खाते थे। शिबू भैया को पेड़ पौधे लगाना काफी पसंद रहा। ऐसे में छत पर गमले लगाने के लिए वह दुकान पर लेकर पहुंचे । लेकिन रिक्शा से गमला लेकर जाते समय मैं रास्ता भटक गया। वह तो भला हो उनका कि उन्होंने मुझे खोज लिया , वरना मुझे लगा कि आज तो मैं भैया रास्ता भटक गया , वह भी दिल्ली में । मोबाइल वाला जमाना नहीं था अपने पास, जिसके पास था कि वह काफी कीमती था। दिल्ली यूनिवर्सिटी में परीक्षा दिलवाने के लिए और जामिया में एक्जाम दिलवाने के लिए पूनम दीदी ने साथ दिया, क्योंकि भैया जॉब करते थे। ऐसे में उनके लिए समय निकाल पाना थोड़ा मुश्किल था। पहली बार दिल्ली में एक और गड़बड़ी हो गई। बुआ और दीदी के साथ फरीदाबाद जाना था,बड़ी बुआ के पास। इसके लिए निजामुद्दीन औलिया(सराय काले खां) से लोकल ट्रेन पकड़नी थी। लेकिन जो ट्रेन पकड़ ली थी उसमें सबसे बड़ी समस्या हो गई की लेडीज बोगी में दोनों चले गए। मैं जेंट्स बोगी में।ट्रेन की भीड़ देखकर ही तो मैं हांफने लगा था। वैसे रोजाना सुबह 4 बजे गोलमोहर मैदान जाने का तजुर्बा तो रहा था,एनसीसी बी सर्टिफिकेट लेकर भी बैठा था, लेकिन दिल्ली की भीड़भाड़ से काफी चिढ़ होती थी। खासकर सरकारी बसों में एक साइड से उतरना होता था और दूसरे साइड से सवार होना था। टिकट भी खुद ही जाकर लेना पड़ता था, इसके लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। अब शिबू भैया ने उस दौरान केवल इंडिया गेट दिखाया। दिल्ली की पहली यात्रा कुछ ऐसी होगी कभी सोचा नहीं था। आलम यह था कि नई दिल्ली स्टेशन आने के लिए भी डर रहा था। लेकिन दिल्ली में हौसला बढ़ाया दीदी ने और उन्होंने दादी से बचते हुए स्टेशन तक पहुंचकर हावड़ा के लिए रवाना किया। भले ही आज देश के तकरीबन हर कोने में ही अपने सहयोगी मित्र हों या फिर कोई भी कोई जान पहचान हो। लेकिन उस दौरान देश की राजधानी दिल्ली जैसे जगह पर किसी का होना यानी सोने और हीरे जवाहरात से कम नहीं था, ऐसा मुझे हमेशा महसूस होता है। अब हम ठहरे हावड़ा निवासी। यहां स्टेशन तो पैदल ही कई बार आना जाना हो जाता है। ऐसे में इस बात का अंदाजा तो था नहीं की स्टेशन दूरी पर भी हो सकता है। वही जाकर पता चला कि नई दिल्ली और केवल दिल्ली यानी कि पुरानी दिल्ली दो अलग-अलग स्टेशन हैं। उस दौरान इन स्टेशनों के लिए मेट्रो की शुरुआत नहीं हुई थी भले ही मेट्रो का काम चल रहा था। यह दिल्ली की पहली यात्रा के कई सारे अनुभव हैं जो कि आपसे साझा किया। वैसे दिल्ली दिलवालों की है और बहुत खूबसूरत है। आज दिल्ली को मिस करता हूं, लेकिन दिल्ली में कभी मन नहीं लगा या यूं कहें कि दिल्ली कभी रास नहीं आई।दिल्ली के अगले यात्रा का वृत्तांत कभी समय मिलने पर।

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