कुंदन गुरु और मरकहा भैंसा...
कुंदन गुरु अपने आप में फक्कड़ हैं। मस्त मौला हैं। मस्त हैं। अपनी धुन के हैं। दरअसल यह आज तक उन्हें भी समझ में नहीं आया वह कुंदन से कुंदन गुरु कब बन गए। इसकी अलग अलग कहानियां हो सकती हैं ।अलग- अलग वजहें हो सकती हैं। चाहे वह शुरू किए गए तत्कालीन समय में पीसीओ की दुकान पर रात भर गुजारने की बात हो या फिर छत पर या फिर स्कूल जाने के क्रम में मिला भैंसा। हर जगह कुंदन गुरु का जलवा रहा है। आज भी है। कुंदन गुरु अगर किसी महफ़िल में पहुंच जाएं तो अपने आप में एक मिसाल हैं या यूं भी कह सकते हैं बेमिसाल हैं। कुंदन गुरु को मानते तो सब हैं, लेकिन सही ढंग से आज तक कोई जान नहीं पाया। यह भी समझ से परे है। खिसियाकर लगातार 100 गारी देने में माहिर कुंदन गुरु से कोई टक्कर नहीं ले सकता है। वह खुद ही कहते हैं कोई नहीं है टक्कर में , क्यों पड़े हो चक्कर में। दरअसल मोहनाठ स्कूल जो कि केवल कक्षा आठवीं तक ही उस समय था ।हम काफी छोटे थे और स्कूल जाने के लिए पैदल ही दो से 4 किलोमीटर (तकरीबन) दूरी तय करनी पड़ती थी ।ऐसे में गांव से एक बड़ी टीम एक साथ ही स्कूल जाने के लिए निकलती थी। स्कूल ना जाने को लेकर भी कई सारे बहाने रोजाना निकालना बड़ी बात थी। यह भी कहा जा सकता है कि कुंदन गुरु इस काम में बहुत माहिर हैं। आज भी माहिर हैं। गांव की जंगल झाड़ियों में दरअसल मरकहा भैंसा , बैल और नीलगाय का मिलना कोई बड़ी बात नहीं है।स्थितियां आज भी कुछ वैसी ही हैं।हालांकि उस समय की बात अलग थी।उतने साधन नहीं थे।आज तो अपने गांव वाले घर में ही कई मोटरसाइकिल रहती है। आजमगढ़ वाले घर पर तो अब चार चकवा भी है। वैसे मरकहा भैंसा उन दिनों रोज नहीं मिलता था ।यह तभी मिलता था जब कुंदन गुरु चाहते थे। यानी कि उनकी स्कूल जाने की इच्छा नहीं होती थी। जब उन्हें स्कूल नहीं जाना होता था तो वह तुरंत रास्ते में मरकहा भैंसा के किस्से सुनाना शुरू करते थे। उन दिनों मरकहा भैंसा का बहुत ज्यादा ही प्रभाव था। वह दूर से ही लोगों को दूर भगाने में बड़ी भूमिका निभाता था।अच्छे अच्छों के छक्के छुड़ाता था ऐसे में लोग उसे देखकर ही भाग लिया करते थे, तो हम जैसे बच्चों की क्या बात थी। कुंदन गुरु के प्रभाव से हम सभी स्कूल जाने से बच जाते थे ।लेकिन आज का समय अजीबोगरीब है ।आजकल तो बच्चे जिद करते हैं स्कूल जाने के लिए। कोई बहानेबाजी नहीं करता ।यदि बहानेबाजी करता भी है बच्चा तो बिल्कुल सामान्य सा बहाना होता है ।पेट में दर्द ,सिर में दर्द। अब भला ऐसे बहानों से स्कूल से छुट्टी कहां मिलने वाली है। कुंदन गुरु पहले गदा भांजते थे। सुबह दौड़ लगाते थे। अब कुंदन गुरु, आपका ध्यान किधर है, मधुशाला इधर है, खोजते हैं। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि यदि मधुशाला के मधु का प्रेम यदि उनका कम हो जाए तो शायद वह पूरे जग को जीतने का माद्दा रखते हैं। उनके सामने अच्छे-अच्छे घुटने टेक देते हैं। कुंदन गुरु को बिना पैलगी किए कोई गुजर नहीं सकता है। ऐसा नहीं है कि कुंदन गुरु में खासियत नहीं है ।देर रात हो या तड़के सुबह हो यदि खेतों में पानी भरना है तो कुंदन गुरु याद आते हैं। उनकी मेहनत और लगन अपने आप में बेमिसाल है ।ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने ग्रामीण प्रेम को छोड़ने की कोशिश न की हो। वह दिल्ली गए ,मुंबई गए, हैदराबाद गए ,इलाहाबाद गए,गुजरात गए लेकिन आखिरकार फिर से लौट कर गांव लौट आए। यह भी कहा जा सकता है कि गांव और वह एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। यदि वह गांव में ना रहें तो शायद लोगों को हंसी ठिठोली का मौका भी नहीं मिलता होगा, ऐसा मेरा मानना है ।वैसे सबके अपने-अपने तर्क हो सकते हैं। उनके सामने रहने पर उन्हें लोग गुरु कहकर ही बुलाते हैं ।यह अलग बात है कि पीठ पीछे शेर को काफी लोग कुछ भी कह सकते हैं।लेकिन शेर तो शेर है अपनी धुन में मस्त। एक बार अपन को हावड़ा आना था बनारस से और कुंदन गुरु को वहीं से दिल्ली जाना था ट्रेन पकड़कर। हमको तो उन्होंने ट्रेन पकड़ा दी, लेकिन बाद में पता चला कि वह गांव लौट गए । यह पूछने पर कि भैया नौकरी का क्या होगा उन्होंने साफ कहा कि दादी क याद आवत रहल। कमबख्त ऐसे बहानों पर भला कुंदन गुरु को कौन और क्या कह सकता है। उम्मीद है कि उनका मधु प्रेम कुछ कम हुआ होगा, क्योंकि मधुशाला से हटकर ही वह सही रास्ते पर आ सकते हैं। वैसे पहले अंतरदेसीय के माध्यम से पत्र वही लिखते रहे। अब तो व्हाट्सएप और फोन के जमाने में भी हम सब की व्यस्तता बढ़ गई है। अपनो से दूरियां भी बढ़ती जा रही हैं ,लेकिन कुंदन गुरु अभी भी मस्त मौला ही हैं।
(नोट:कृपया इसे एक किस्से के रूप में ही लें, एक किस्से का पात्र ही मानें।)
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