मजदूर दिवस यूं ही तारीख न रह जाए

 मजदूर दिवस के इतिहास की बातें नहीं बल्कि हकीकत की बातें होनी जरूरी हैं। मजदूर दिवस के नाम पर आज भारत समेत कई देशों में श्रमिक अधिकारों के नाम पर श्रमिकों को अवकाश तो मिलता है। हालां‌कि इस अ‍वकाश के लिए भी पहले के श्रमिकों को कड़े आंदोलन व अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ी थी। आलम यह है कि श्रम अधिकारों की बातें तो आज हर वर्ग के लोग करते हैं, हालांकि श्रमिकों का शोषण कितना हो रहा है वह एक श्रमिक ही जानता है। यह श्रमिक वर्ग कौन है, बात यह नहीं है। बात केवल यही है ‌कि हर श्रमिक को उसकी मेहनत व लगन का मेहनताना, उसका अधिकार मिलना चाहिए। काम के अनुसार वेतन की बातें होनी चाहिए। श्रम अधिकारों के लिए आंदोलन के नाम पर अब राजनीतिक दलों से लेकर श्रम संगठनों को सोचने की आवश्यकता है। एक श्रमिक अपने श्रम का ही हिस्सा चाहता है। श्रमिकों का विकास आज कहां और किस हद तक हुआ है, यह भी काफी सोचनीय विषय है। ऐसा तो नहीं कि श्र‌मिक वर्ग की तस्वीर बदल गई है। तस्वीर आज भी आजादी के पहले की तरह ही है। बड़े पैमाने पर आज भी श्रमिक वर्ग शोषण के शिकार हो रहे हैं। शोषण जारी है, इसके तरीके बदल गए हैं। श्रम अधिकारों के प्रति सचेत होने का समय है। रोटी-कपड़ा और मकान ही नहीं शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए आज भी श्रमिक वर्ग को जूझना ही पड़ रहा है। तो चलो तय करें  श्रमिकों के विकास का रास्ता। बाल श्रम को दूर करने की केवल बातें ही आज भी हो रही हैं। ऐसा मालूम पड़ता है कि यह केवल किताबों में ही रह जाएंगी। जरूरत है और सचेत होने की। इन बातों को अन्यथा या दिल पर न लें। बस समझें। एक श्रमिक वर्ग की व्यथा और कथा। देखें अपने आस-पास के श्रमिकों की स्थिति। अब तो श्रम अधिकारों के नाम पर चल रहे यूनियन को चलाने पर भी पाबंदी सी है। कुछ बची भी है तो वह शायद चाटूकारिता पर ही जीवित प्रतीत होती है। 

मई दिवस की शुभकामनाएं। मजदूर एकता जिंदाबाद। श्रमिक अधिकार जिंदाबाद।

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